न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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इन्द्रियस्यार्थेन सन्निकर्षादुत्पद्यते यज्ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् ।
न तर्हीदानीमिदं भवति—'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रिय-
मर्थेन' इति ? नेदं कारणावधारणम्—एतावत्प्रत्यक्षं कारणमिति, किन्तु विशिष्ट-
कारणवचनमिति । यत्प्रत्यक्षज्ञानस्य विशिष्टकारणं तदुच्यते; यत्तु समानमनु-
मानादिज्ञानस्य, न तन्निवर्त्तत इति ।
मनसस्तर्हीन्द्रियेण संयोगो वक्तव्यः ? भिद्यमानस्य प्रत्यक्षज्ञानस्य ना-
भिद्यत इति समानत्वान्नोक्त इति ।
यावदर्थं वै नामधेयशब्दास्तैरर्थसम्प्रत्ययः, अर्थसम्प्रत्ययाच्च व्यवहारः
तत्रेदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नमर्थज्ञानम् 'रूपम्' इति वा, 'रसः' इत्येवं वा
भवति, रूपरसशब्दाश्च विषयनामधेयम्, तेन व्यपदिश्यते ज्ञानम्—'रूपमिति
जानीते, रस इति जानीते'; नामधेय शब्देन व्यपदिश्यमानं सत् शाब्दं प्रसज्यते ?
अत आह—अव्यपदेश्यमिति । यदिदमनुपयुक्त शब्दार्थसम्बन्धेऽर्थज्ञानम्, न तद्
नामधेय शब्देन व्यपदिश्यते । गृहीतेऽपि च शब्दार्थसम्बन्धेऽस्यार्थस्यायं शब्द
इन्द्रिय और अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं ।
तब यह सिद्धान्त सम्भव नहीं है—'आत्मा मन से संयुक्त होता है, मन इन्द्रिय से,
इन्द्रिय अर्थ से' ? ऐसा नहीं; क्योंकि हम सभी कारणों का निश्चय नहीं कर रहे कि इतने
प्रत्यक्ष में कारण हैं, अपितु विशिष्ट कारण बता रहे हैं । जो प्रत्यक्ष का विशिष्ट कारण
है, वह बता दिया गया है; तथा जो सामान्य कारण हैं, जिनका उपयोग अनुमान-आदि
ज्ञान में भी होता है, उनका निषेध नहीं किया गया ।
विशिष्ट कारण ही जब ग्रहण का प्रयोजक है तो मन इन्द्रिय के संयोग को प्रत्यक्ष में
कारण कहना चाहिए ? सूत्रकार ने विभक्त किए जा रहे प्रत्यक्ष-लक्षण में एक व्यावर्तक
देकर काम चला दिया है, दूसरे कारण ( इन्द्रिय-मनःसंयोग ) के अनुमान में भी घटित
होने से वह प्रत्यक्ष का सामान्य व्यावर्तक नही बन सकता । अतः लक्षण में उसे नहीं
कहा गया ।
शङ्का—अर्थ हमेशा हर जगह नामधेय ( संज्ञा ) से सम्पृक्त रहते हैं, ऐसा कोई
अर्थ नहीं है जो नामधेय से पृथक् रहता हो, तथा अर्थज्ञान से ही लोकव्यवहार चलता
है । उस ( लोकव्यवहार ) में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'रूप' ऐसा या 'रस' ऐसा
ज्ञान होता है, रूप, रस, शब्द आदि विषय के नाम हैं । इससे 'रूप—ऐसा जानता हैं',
'रस—ऐसा जानता है' इस प्रकार यह अभेदात्मक ज्ञान व्यवहृत होता है, परन्तु नामधेय
शब्द से व्यवहृत ज्ञान शाब्दज्ञान ( विषयाभिन्न = सविकल्पक ) प्रमाण से सम्बद्ध होता
है ? इसलिये प्रत्यक्षलक्षण में व्यावर्तक लगाते हैं—'अव्यपदेश्य' । अगृहीत शब्दार्थ-
सम्बन्ध की दशा में जो अर्थज्ञान होता है वह उसका नामधेय शब्द से व्यपदिष्ट नहीं
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