न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३. सू० ] सर्वनित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८९
उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धिविषयस्याप्यभावे सर्वव्यवहारविलोप इति,. सोऽयं
नित्यानामतीन्द्रियत्वादविषयत्वाच्चोत्पत्तिविनाशयोः 'स्वप्नविषयाभिमानवत्'—
इत्यहेतुरिति ॥ ३२ ॥
अवस्थितस्योपादानस्य धर्ममात्रं निवर्तते धर्ममात्रमुपजायते, स खलूत्पत्ति-
विनाशयोर्विषयः । यच्चोपजायते तत्रागप्युपजननादस्ति, यच्च निवर्तते तन्नि-
वृत्तमप्यस्तीति, एवं च सर्वस्य नित्यत्वमिति ?
न; व्यवस्थानुपपत्तेः ॥ ३३ ॥
अयमुपजनः, इयं निवृत्तिः—इति व्यवस्था नोपपद्यते; उपजातनिवृत्तयोर्विद्य-
मानत्वात् । अयं धर्म उपजातः, अयं निवृत्तः—इति सद्भावाविशेषादव्यवस्था ।
इदानीमुपजननिवृत्ती, नेदानीम्—इति कालव्यवस्था नोपपद्यते; सर्वदा विद्यमा-
नत्वात् । अस्य धर्मस्योपजननिवृत्ती, नास्य—इति व्यवस्थानुपपत्ति; उभयोरविशे-
षात् । अनागतोऽतीतः—इति च कालव्यवस्थानुपपत्तिः; वर्तमानस्य सद्भावलक्षण-
त्वात् ।
अविद्यमानस्यात्मलाभ उपजनः, विद्यमानस्यात्महानं निवृत्तिः—इत्येतस्मिन्
होने लगेगा ? यह बात उत्पत्तिविनाशकारणों की उपलब्धि के विषय में भी तुल्य ही
है । अर्थात् उत्पत्तिविनाशकारण तथा उसकी उपलब्धि को मिथ्या मानोगे तब भी तो
समग्र व्यवहार ( पुरुषप्रयत्नादि ) विलुप्त होने लगेगा । अतः यह स्वप्नविषयक अभिमान
अहेतुक ही है अर्थात् वह इन्द्रियगोचर नहीं होता; क्योंकि नित्य भूत अतीन्द्रिय तथा
उत्पत्तिविनाशविषयक होते हैं ॥ ३२ ॥
कुछ दूसरे दार्शनिक ( स्वायम्भुव ) कहते हैं कि उपादान ( सुवर्णादि ) धर्मी का
केवल ( एक ) धर्म निवृत्त होता है, तथा एक धर्म उत्पन्न होता है, अर्थात् यह धर्म
ही उत्पत्ति तथा विनाश का विषय है ! अतः जो उत्पन्न होता है वह उत्पन्न होने से
पूर्व भी ( धर्म्यभिन्न रूप में ) रहता है तथा जो विनष्ट होता है वह विनाश के बाद
भी (धर्म्यभिन्न रूप में) रहता है। इस नय से सब कुछ का नित्यत्व उत्पन्न हो जायेगा ?
व्यवस्था के अनुपपन्न होने से वैसा नित्यत्व नहीं बन पाता ॥ ३३ ॥
इस मत के अनुसार यदि उपजात तथा विनष्ट भी विद्यमान ही रहेंगे तो 'यह जन्म
है, यह नाश है'—ऐसी लोकानुभवसिद्ध व्यवस्था नहीं बन पायेगी । 'यह धर्म उत्पन्न
हुआ तथा यह धर्म विनष्ट हुआ' यह स्वरूपव्यवस्था भी सदसद्भाव में कोई भेद न होने से
नहीं बन पायेगी । और 'इस समय उत्पत्ति-विनाश हो रहे हैं, इस समय नहीं'—यह
कालव्यवस्था भी सदसद्भाव में कोई अन्तर न होने से नहीं हो पायेगी । तथा 'इसके धर्म
उत्पन्न-विनष्ट हुए, इस के नहीं' यों सदसद्भाव में कोई वैशिष्ट्य न होने से सम्बन्ध-
व्यवस्था भी नहीं बन पायेगी । उत्पत्ति-विनाश की भूतभविष्यत् व्यवस्था भी सद्भाव
के ही वर्तमान रहने से न बन पायेगी ।
हमारे मत में तो अविद्यमान का आत्मलाभ 'उत्पत्ति' तथा विद्यमान का नाश 'निवृत्ति'
न्या० द० ३७