न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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अभौतिकं च बुद्ध्यादि; तदुभयमुत्पत्तिविनाशधर्मकं विज्ञायते । तस्मात् तत्सर्वम-
नित्यमिति ? ॥ २५ ॥
न; अनित्यतानित्यत्वात् ॥ २६ ॥
यदि तावत् सर्वस्यानित्यता नित्या ? तन्नित्यत्वान्न सर्वमनित्यम् । अथा-
नित्या ? तस्यामविद्यमानायां सर्वं नित्यमिति ॥ २६ ॥
तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्यं विनाश्यानुविनाशवत् ॥ २७ ॥
तस्या अनित्यताया अप्यनित्यत्वम् । कथम् ? यथा-अग्निर्दाह्यं विनाश्यानु-
विनश्यति, एवं सर्वस्यानित्यता सर्वं विनाश्यानुविनश्यतीति ॥ २७ ॥
नित्यस्याप्रत्याख्यानम्; यथोपलब्धि व्यवस्थानात् ॥ २८ ॥
अयं खलु वादो नित्यं प्रत्याचष्टे, नित्यस्य च प्रत्याख्यानमनुपपन्नम् ।
कस्मात् ? यथोपलब्धि व्यवस्थानात् । यस्योत्पत्तिविनाशधर्मकत्वमुपलभ्यते
प्रमाणतस्तदनित्यम्, यस्य नोपलभ्यते तद्विपरीतम् । न च परमसूक्ष्माणां भूता-
शरीरादि तथा अभौतिक बुद्ध्यादि । ये दोनों ही वर्ग उत्पत्तिविनाशधर्मक हैं अतः सब
कुछ अनित्य हैं ? ॥ २५ ॥
एकदेशिमत से परिहार—
अनित्यता में नित्यता होने से आपका मत उचित नहीं ॥ २६ ॥
यदि यह सब की अनित्यता नित्य है तो इस नित्यता से सब कुछ अनित्य नहीं
रहा, अपितु नित्य हो जायगा । क्योंकि यदि वह अनित्य है तो उसके न होने पर सब
नित्य हो जायेगा ॥ २६ ॥
सिद्धान्तिमत से उत्तर—
जैसे अग्नि दाह्य काष्ठादि को जलाकर स्वयं विनष्ट हो जाती है उसी तरह हव
अनित्यता भी अनित्य है ॥ २७ ॥
उस अनित्यता में भी अनित्यत्व उपपन्न है । कैसे ? जैसे अग्नि जलाने योग्य
काष्ठादि को जला कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है, इसी तरह यह सब प्रमेयों की
अनित्यता सबको विनष्ट ( अनित्य बता ) कर स्वयं भी विनष्ट ( अनित्य ) हो
जायेगी ॥ २७ ॥
उपलब्धि के अनुसार व्यवस्था से नित्य का प्रत्याख्यान नहीं होता ॥ २८ ॥
यह वाद ( प्रकरण ) नित्य का प्रत्याख्यान करने के लिए उठाया है, परन्तु नित्य
का प्रत्याख्यान नहीं बन पा रहा है; क्योंकि व्यवस्था उपलब्धि के अनुसार देखी जाती
है । प्रमाण से जिसकी उत्पत्ति विनाशशील देखी जाती है, वह अनित्य होता है, तथा
जो प्रमाण से उत्पत्ति एवं विनाशशील नहीं ज्ञात होता वह नित्य है। परमसूक्ष्म भूत,
आकाश, काल, दिग्, आत्मा, मन तथा आकाश और सूक्ष्मभूत के कतिपय गुणों की;