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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ११
छलजातिनिग्रहस्थानानां पृथगुपदेश उपलक्षणार्थमिति । उपलक्षितानां
स्ववाक्ये परिवर्जनम्, छलजातिनिग्रहस्थानानां परवाक्ये पर्यनुयोगः । जातेश्च
परेण प्रयुज्यमानायाः सुलभः समाधिः, स्वयं च सुकरः प्रयोग इति ।
सेयमान्वीक्षिकी प्रमाणादिभिः पदार्थैर्विभज्यमाना—
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्त्तिता ॥
तदिदं तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसाधिगमार्थं १ यथाविद्यं वेदितव्यम् । इह त्वध्यात्म-
विद्यायामात्मादितत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानम्, निःश्रेयसाधिगमोऽपवर्गप्राप्तिरिति ॥१॥
तत् खलु निःश्रेयसं किं तत्त्वज्ञानानन्तरमेव भवति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ?
तत्त्वज्ञानात्—
क्योंकि एक वाद में सभी निग्रहस्थानों का उद्भावन सम्भव नहीं है, परन्तु हेत्वाभास
ऐसे निग्रहस्थान हैं जिनका वाद से सर्वथा उद्भावन हो सकता है । इसलिए इनका पृथक्
उपदेश किया है ।
छल, जाति, निग्रहस्थान—इनका उपदेश उपलक्षण के लिये है । उपलक्षित छल,
जाति, निग्रहस्थानों का अपने वाक्य में त्याग और दूसरों के वाक्य में प्रयोग किया जा
सकता है । दूसरे द्वारा प्रयुक्त जाति का समाधान विद्वानों के लिये सुलभ है, अपने वाक्य
में उसका प्रयोग करना भी उनके लिये सरल है ।
इस प्रकार ये संशयादि पदार्थ प्रमाण या प्रमेय में अन्तर्भूत होते हुए भी न्यायविद्या
का प्रस्थान-भेद बताने के लिये पृथक् पढ़े गये हैं ।
यह आन्वीक्षिकी विद्या प्रमाणादि पदार्थों से विभक्त होती हुई, सभी अन्य विद्याओं
के लिये दीपोपम है, सभी लौकिक-वैदिक कार्यों की उपकारिका (भृत्यादिवत् सहायिका)
है, सभी धर्मों की आश्रय है । इस विद्या का यह संक्षिप्त रूप अर्थशास्त्र के विद्योद्देश में
बताया गया है ।
यह 'तत्त्वज्ञान' और 'निःश्रेयसप्राप्ति' उस-उस विद्या के अनुसार ही समझना
चाहिये । इस आन्वीक्षिकी विद्या (न्यायशास्त्र) में, जो कि अध्यात्म विद्या भी कहलाती
है, आत्मा-आदि प्रमेयों का तत्त्वज्ञान ही 'तत्त्वज्ञान' कहलाता है और निःश्रेयसप्राप्ति
'मोक्षप्राप्ति' कहलाती है ॥ १ ॥
तो क्या यह निःश्रेयस (मोक्ष) तत्त्वज्ञान के बाद ही हो जाता है ? नहीं ! अपितु
तत्त्वज्ञानसे—
१. 'निःश्रेयसाधिगमश्च'—इति पाठ० ।