न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११. सू०] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३
प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ८-२० ]
अथ प्रमाणपरीक्षा ।
प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः ? ॥ ८॥
प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं नास्ति, त्रैकाल्यासिद्धेः । पूर्वापरसहभावानुप-
पत्तेरित्यर्थः ॥ ८ ॥
अस्य सामान्यवचनस्यार्थविभागः—
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः ? ॥ ९ ॥
गन्धादिविषयं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, तद्यदि पूर्वम्, पश्चाद् गन्धादीनां सिद्धिः ? नेदं
गन्धादिसन्निकर्षादुत्पद्यत इति ॥ ९ ॥
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १० ॥
असति प्रमाणे, केन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयः स्यात् ? प्रमाणेन खलु प्रमीय-
माणोऽर्थः प्रमेयमित्येतत्सिध्यति ॥ १० ॥
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम् ॥ ११ ॥
अब प्रमाण की परीक्षा की जा रही है—
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द में प्रामाण्य नहीं बन सकता; क्योंकि प्रमेय
पदार्थ की त्रिकाल (भूत, भविष्यत्, वर्तमान) में सिद्धि नहीं हो पाती ॥ ८ ॥
प्रत्यक्षादिकों में प्रमाणत्व नहीं घटेगा; क्योंकि उनके प्रमेय की त्रिकाल में सिद्धि
नहीं हो सकती; यतः पूर्वोत्तरसामानाधिकरण्य अनुपपन्न होता है ॥ ८ ॥
पूर्वपक्षी के इस सामान्य वचन का अर्थ यों समझें—
प्रमेय से पूर्वकाल में प्रमाण की सिद्धि मानें तो 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष होता
है'—यह सिद्धान्ती का प्रत्यक्ष लक्षण नहीं बनेगा ॥ ९ ॥
गन्धादिविषयक ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, वह यदि गन्धादि से पूर्वकाल में उत्पन्न होगा
तो उस समय गन्धादि के न रहने से वहाँ सन्निकर्ष किसका बनेगा ? सन्निकर्ष न बनने
से प्रत्यक्ष किसका होगा ? ॥ ९ ॥
गन्धादि प्रमेय के अपर (पश्चात्) काल में इस प्रत्यक्ष को सिद्धि मानें तो 'प्रमाणों
से प्रमेयसिद्धि' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ॥ १० ॥
गन्धादि प्रमेय के समय प्रमाण के न रहने पर प्रमेय किससे प्रमित होगा ? प्रमाण के
सहारे ही प्रमीयमाण अर्थ प्रमेय सिद्ध होता है ॥ १० ॥
यदि उक्त प्रमाण-प्रमेय की एक काल में सिद्धि मानो जाये तो ज्ञान के प्रत्यर्थनियत
होने से उसकी क्रमवृत्ति न हो पायेगी ॥ ११ ॥
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