नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ नीतिवाक्यममृतम्
अपात्र में दान की निन्दा—
भस्मनि हुतमिवापात्रेष्वर्थव्ययः ॥ १२ ॥
अपात्र अथवा कुपात्र के निमित्त अर्थ का व्यय करना राख के ढेर में
आहुति देने के समान है ।
पात्रभेद—
पात्रञ्च त्रिविधं धर्मपात्रं कार्यपात्रं कामपात्रञ्चेति ॥ १३ ॥
पात्र तीन प्रकार के हैं धर्म पात्र कार्य पात्र और कामपात्र ।
विशेषार्थ—जिनकी शिक्षा दीक्षा और सदाचार से हम सत्पथ पर
आरूढ हों वह धर्मपात्र हैं । जिनसे सांसारिक कार्य सिद्ध हो वह कार्यपात्र हैं
और अपनी गृहिणी काम पात्र है क्योंकि उसके द्वारा इहलोक-परलोक दोनों
बनता है ।
कीर्ति कैसी हो ?—
किं तया कीर्त्या या आश्रितान्न विभर्त्ति प्रतिरुणद्धि वा धर्मम् ।
भागीरथी-श्री-पर्वतवद् भावानामन्यदेव प्रसिद्धेः कारणं न पुनस्त्यागः ।
यतो न खलु गृहीतारो व्यापिनः सनातनाश्च ॥ १४ ॥
जिससे आश्रितों का भरण-पोषण न हो सके और जो धर्म के प्रतिकूल
हो उस कीर्ति से क्या लाभ है ।
गंगा, लक्ष्मी और विन्ध्य हिमालय आदि पर्वत विशेष के समान प्रसिद्धि
का कारण कुछ दूसरा ही होता है, त्याग नहीं । क्योंकि लाभान्वित होनेवाले
व्यक्ति व्यापक और सनातन नहीं होते ।
विशेषार्थ—अर्थात् धूर्त्त खुशामदी शराबी और दुराचारिणी स्त्रियां आदि
यदि हम से द्रव्य पाकर हमारी प्रशंसा करते फिरें और हमारे कुटुम्बी भूखों
मरें तो हमारी वह कीर्ति व्यर्थ है । दुष्टों का उत्कर्ष करने वाली यह कीर्ति
धर्म विरोधिनी भी स्पष्ट है ।
धन की सार्थकता के विषय में—
स खलु कस्यापि माभूदर्थो यत्रासंविभागः शरणागतानाम् ॥ १५ ॥
जिस धनमें से शरणागतों को विभाग न किया जाय ऐसा धन किसी
को न हो ।
एकान्त लोभी की निन्दा—
अर्थिषु संविभागः स्वयमुपभोगश्चार्थस्य हि द्वे फले, नास्त्यौचित्य-
मेकान्तलुब्धस्य ॥ १६ ॥
याचकों को दान देना और स्वयम् उपभोग करना, अर्थ के ये ही दो
प्रयोजन हैं । एकान्त लोभी व्यक्ति के धन का कोई "औचित्य" नहीं है ।