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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 220 में से

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पृष्ठ 18

२ नीतिवाक्यामृतम्
नमोऽस्तु राज्यवृक्षाय षाड्गुण्याय प्रशाखिने ।
सामादिचारुपुष्पाय त्रिवर्गफलदायिने ॥
नीति-ग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की वन्दना बड़ी उपयुक्त और सुन्दर
कल्पना है ।
धर्म का लक्षण —
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥ २ ॥
जिससे मानव का अभ्युदय और कल्याण हो वह धर्म है ।
विशेषार्थ—महर्षि कणाद के मत से अभ्युदय का अर्थ तत्त्वज्ञान और
निःश्रेयस का दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति है । इस प्रकार तत्त्वज्ञान के द्वारा
दुःख की अत्यन्त निवृत्ति धर्म है, महर्षि गौतम के अनुसार अभ्युदय अर्थात्
स्वर्ग और निःश्रेयस् अर्थात् मोक्ष जिससे प्राप्त हो वह धर्म है । मीमांसकों के
चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः' इस सूत्र के अनुसार वेदों के द्वारा प्रतिपादित कर्म ही
धर्म है । किन्तु वेदों के द्वारा उपदिष्ट क्या सभी कर्म अविचारणीय और
आवश्यक रूप से कर्त्तव्य हैं ऐसा कहकर इस मत का खण्डन भी किया
जाता है ।
अधर्म का लक्षण—
अधर्मः पुनरेतद् विपरीतफलः ॥ ३ ॥
जिस कार्य का फल अभ्युदय और निःश्रेयस् से विपरीत हो वह
अधर्म है ।
धर्मप्राप्ति के उपाय —
आत्मवत् परत्र कुशलचिन्तनं शक्तितस्त्यागतपसी च धर्माधिगमो-
पायाः ॥ ४ ॥
अपने ही समान दूसरे के कुशल और कल्याण का चिन्तन तथा शक्ति के
अनुसार त्याग, तपस्या करना धर्म की प्राप्ति के साधन हैं ।
श्रेष्ठ आचरण—
सर्वसत्वेषु हि समता सर्वाचरणानां परमाचरणम् ॥ ५ ॥
जीव-मात्र पर समता अर्थात् निर्वैरता का भाव समस्त शुभ आचरणों में
श्रेष्ठ आचरण है ।
जीवद्रोहियों की दशा का वर्णन —
न खलु भूतद्रुहां कापि क्रिया प्रसूते श्रेयांसि ॥ ६ ॥
जीवों से द्रोह करनेवाले व्यक्ति की कोई भी क्रिया कल्याण-कारिणी
नहीं होती ।
विशेषार्थ—जीव चार प्रकार के हैं—स्वेदज, अण्डज, उद्भिज और