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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

भर्तृहरिविरचितं

नीतिशतकम्

(प्रस्तावना, हिन्दी-संस्कृत व्याख्या)

डॉ० राकेश शास्त्री

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परिमल संस्कृत ग्रन्थमाला—46

श्रीभर्तृहरिविरचितम्

नीतिशतकम्

(विस्तृत भूमिका, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या,
व्याकरणात्मक एवं आलोचनात्मक टिप्पणी सहित)

व्याख्याकार
डॉ० राकेश शास्त्री
बी० ए० (आनर्स), एम. ए. (संस्कृत)) डी.फिल्.
साहित्य-पुराणेतिहासाचार्य (लब्धस्वर्णपदक द्वय)
अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
बांसवाड़ा (राजस्थान)


परिमल पब्लिकेशन्स
दिल्ली - ११०००७

प्रकाशक
परिमल पब्लिकेशन्स
२७/२८, शक्ति नगर
दिल्ली- ११०००७

© लेखक
द्वितीय संस्करण १९९८
तृतीय संस्करण २००३

मूल्य : ६०.०० रुपये

ISBN: 81-7110-132-8

मुद्रक
हिमांशु लेजर सिस्टम
४६, संस्कृत नगर
रोहिणी सेक्टर- १४
दिल्ली-११००८५
फोन- ७८६२१८३

समर्पण

हिन्दी जगत् की
प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं कहानीकार,
स्नेह ममता एवं वात्सल्य की प्रतिपूर्ति,
प्रातःस्मरणीया, पूजनीया अम्मा जी,
डॉ० शशि प्रभा शास्त्री
के कर-कमलों में
सादर समर्पित

पुस्तक परिचय

संस्कृत में खण्डकाव्य के अन्तर्गत स्तोत्र एवं नीति-विषयक काव्य प्रायः मुक्तक काव्य के रूप में उपलब्ध होते हैं। महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित शृंगारशतक, नीतिशतक तथा वैराग्य शतक, मुक्तक काव्य के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इस शतक के सौ से अधिक श्लोकों में कवि ने विद्या, परोपकार, वीरता, परिश्रम, साहस और उदारता आदि उदात्त मनोभावों का सरल भाषा में मनोहारी चित्रण किया है। इसमें कवि के ऐश्वर्य सम्पन्न राजाओं की निष्ठुरता, हृदयहीनता, अहंकारिता, दुर्जनों एवं मूर्खों के द्वारा सज्जनों को दिए जाने वाले कष्टों एवं अपमान का चित्रण करते हुए, उसके प्रति विद्रोहात्मक स्वर को मुखरता मिली हैं। अनेक नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए, मानवतावादी दृष्टिकोण को अत्यन्त हृदयग्राही रूप में यहाँ चित्रित किया गया है। वस्तुतः नीतिशतकम् सम्पूर्ण सूक्ति-साहित्य का अलंकार स्वरूप ग्रन्थ है, जिसमें अनेक दीप्तिमान् माणिक स्थल-स्थल पर जड़े हुए हैं।


लेखक परिचय

राजकीय महाविद्यालय, बांसवाड़ा में स्नातकोत्तर संस्कृत-विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत डॉ० राकेश शास्त्री संस्कृत के लिए पूर्णतया समर्पित व्यक्तित्व हैं। आपने राजस्थान के सुदूर आदिवासी जनजाति बहुल अंचल में संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए अनेक कार्य करके उल्लेखनीय योगदान दिया है। यही कारण है कि आज इस क्षेत्र में युवापीढ़ी में संस्कृत के प्रति रुझान बढ़ा है।

२० मार्च १९५५ में मेरठ के निकट दोराला ग्राम में जन्मे डॉ० शास्त्री ने सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की हैं। साथ ही बी०ए० (आनर्स), १९७५ की परीक्षा में महाविद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्तकर वि० वी० की मैरिट लिस्ट में छठा स्थान प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त पुराणितिहासाचार्य परीक्षा में सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि० वी० में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। आपका शोधकार्य ऋग्वेद के निपातों पर है।

आपकी अबतक वेद, उपनिषद्, दर्शन, व्याकरण साहित्य एवं पुराणों पर लगभग १० पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संस्कृत को सरल करने की दिशा में आपका उल्लेखनीय योगदान है। आपकी एक व्याकरण पुस्तक "स्नातक संस्कृत सरला' को राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा मार्च, ९७ में नवोदित प्रतिभा पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

अध्ययन, अध्यापन, लेखन एवं शोध में आपकी गहन रुचि है। बहुत शीघ्र ही आपकी कुछ अन्य पुस्तकें प्रकाशित होने वाली हैं।

प्रकाशित-पुस्तक सूची

१. ऋग्वेद के नियात, २. मार्कण्डेय महापुराण (हिन्दी अनुवाद), ३. मधु कणिका४. स्नातक संस्कृत सरला, ५. नीतिशतकम्, ६. ऋक् सूक्त चन्द्रिका, ७. बृहदारण्य कोपनिषद् (तृतीय अध्याय), ८. सुगम संस्कृत व्याकरण, ९. सांख्यकारिका, १०. मनुस्मृति (द्वितीय अध्याय), ११. नागानन्दम्

दो शब्द

नीतिशतकम् की प्रस्तुत पुस्तक को देखकर यह उत्सुकता स्वाभाविक है कि इतनी व्याख्याएँ होने पर एक और व्याख्या क्यों? इस विषय में मेरा विनम्र निवेदन है कि हमारे विद्यार्थियों की एक जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से रहती है कि किसी श्लोक की हिन्दी व्याख्या किस प्रकार की जाए, क्योंकि उपलब्ध नीतिशतकम् की व्याख्याओं से उनकी इस जिज्ञासा की निवृत्ति नहीं होती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए यह व्याख्या लिखने का विनम्र प्रयास किया गया है।

यह व्याख्या मेरे पिछले लगभग १५ वर्षों के अध्यापन अनुभव का परिणाम है। इस विषय में मेरा प्रयत्न रहा है कि यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिए साक्षात् अध्यापक के समान मार्गदर्शन करे, क्योंकि इसमें अत्यन्त सरल बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दों से प्रायः बचने का ही प्रयास रहा है।

मूल श्लोकों के बाद अन्वय, शब्दानुसार हिन्दी अनुवाद देने के बाद विस्तृत हिन्दी व्याख्या दी गई है। व्याख्या में श्लोक में निहित गूढ़तम भावों को भी स्पष्ट करने का प्रयास रहा है। तत्पश्चात् व्याख्यात्मक एवं व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ देते हुए श्लोक की सर्वांगीण व्याख्या प्रस्तुत करना ही प्रमुख दृष्टिकोण रहा है।

विशेष के अन्तर्गत श्लोक में निहित गूढ़ रहस्यों, अलंकार, छन्द आदि का उल्लेख किया गया है। छन्दों का यद्यपि बार-बार प्रयोग हुआ है, तथापि छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए छन्दों का लक्षण उसी स्थल पर बार-बार दिया गया है। इसके पीछे भावना रही है कि उन छन्दों के लक्षण बार-बार पढ़ने से हमारे छात्र उन्हें हृदयंगम कर सकें।

व्याकरणात्मक टिप्पणी के अन्तर्गत शब्द निर्माण में धातु, प्रकृति, प्रत्यय, समास-विग्रह, समास का नाम आदि विस्तारपूर्वक दिए गए हैं। इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य रहा है कि छात्रों के व्याकरण विषयक ज्ञान में वृद्धि हो। इसी शीर्षक के अन्तर्गत संधि-विच्छेद करके संधि का नाम तथा संधि-सूत्र का भी उल्लेख किया गया है, जिससे छात्रों को संधि के स्वरूप को समझ कर श्लोक के अर्थ को समझने में भी सहायता प्राप्त हो।

नीतिशतकम् की सभी उपलब्ध प्रतियों में श्लोकों का क्रम एक जैसा नहीं है। साथ ही कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जो कुछ प्रतियों में नहीं मिलते हैं। हमने इन सभी श्लोकों का विषयवार संग्रह करके विद्यार्थियों के हित को देखते हुए सभी की व्याख्या प्रस्तुत की है।

६

तथा श्लोकों का क्रम निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित भर्तृहरित्रिशती के आधार पर रखा है।

पुस्तक के प्रारम्भ में विस्तृत भूमिका दी गई है। जिसमें गीतिकाव्य का स्वरूप, गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास, संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ आदि विषयों का तथा कवि भर्तृहरि के जीवनचरित, स्थितिकाल, कृतियाँ एवं भाषा शैली आदि का विस्तार से उल्लेख किया है, क्योंकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में कवि एवं कृति पर प्रश्न पूछने की परम्परा रही है।

भूमिका में ही सभी दस पद्धतियों का सारांश देने का विचार था, किन्तु उससे पुस्तक के कलेवर में अत्यधिक वृद्धि हो जाती, जिससे बचने के लिए हमने परिशिष्ट में केवल एक विद्वत्पद्धति का सारांश दे दिया है। छात्रों को उसके आधार पर ही अन्य पद्धतियों के सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।

कुछ विश्वविद्यालयों में श्लोकों की संस्कृत व्याख्या भी परीक्षा में पूछी जाती है। हमने प्रत्येक श्लोक की संस्कृत व्याख्या न करके नमूने के रूप में एक श्लोक की व्याख्या परिशिष्ट में दी है। उसके आधार पर अन्य श्लोकों की संस्कृत व्याख्या की जा सकती है।

छात्रों में एक जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए श्लोक की हम किस प्रकार हिन्दी व्याख्या करें। उनकी इस जिज्ञासा के लिए हमने परिशिष्ट में एक हिन्दी व्याख्या भी उदाहरण रूप में दी है।

प्रत्येक श्लोक के कुछ कठिन शब्दों के अर्थों को भी परिशिष्ट के अन्तर्गत पुस्तक के अन्त में अकारादिक्रम में दिया गया है। साथ ही वहीं पर श्लोकानुक्रमणिका का भी उल्लेख किया गया है।

तदनन्तर में इस पुस्तक की प्रेरणास्रोत मेरी शक्ति-स्वरूपा सहधर्मिणी डॉ. प्रतिमा शास्त्री, व्याख्याता (स्कूल-शिक्षा) के प्रति भूरिशः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। जिन्होंने मुझे बार-बार स्मरण कराते हुए इस कार्य को शीघ्र पूर्ण करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया एवं अनेक दायित्वों को अपने ऊपर लेकर सहयोग प्रदान किया। कु० प्राची शास्त्री ने तो पाण्डुलिपि तैयार करने में भी अनेकशः सहायता की है। एतदर्थ उसे कोटिशः आशीर्वाद। नन्हें आत्मज आयुष्मान् सुवासित शास्त्री को भी असीम शुभकामनाएँ और हार्दिक प्यार इस कामना के साथ कि उसका भी निरन्तर संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुझान हो।

अन्त में मैं संक्षेप में केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि हमारी आने वाली संस्कृत अध्येता छात्रों की पीढ़ी का व्याकरण विषयक ज्ञान अत्यल्प है। वह इसे अत्यन्त क्लिष्ट

७

समझती है। प्रस्तुत पुस्तक उसकी इस भावना को दूर करने का एक तुच्छ प्रयास मात्र है। जो अत्यन्त विनम्र भाव से अर्पित है।

इस पुस्तक के लेखन में मुझे अभी तक प्रकाशित सभी नीतिशतकम् की व्याख्याओं से सहायता प्राप्त हुई, एतदर्थ मैं उन सभी के विद्वान् व्याख्याकारों का हृदय से आभार व्यक्त करना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ। इति शम्

१४ मार्च, १९९६ -
शास्त्री निलयम्, १ एच ३१,
हाउसिंग बोर्ड कालोनी,
बांसवाड़ा - ३२७००१
दूरभाष - ०२९६२/४१०२६

विदुषां वशंवद
राकेश शास्त्री

विषय-सूची

१. दो शब्द५
२. भूमिका९
(क) गीतिकाव्य का स्वरूप१०
(ख) गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास१०
(ग) संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ११
(घ) भर्तृहरि का जीवन चरित१३
(ङ) स्थितिकाल१५
(च) कृतियाँ१७
(छ) भाषा शैली१८
अथ नीतिशतकम्१
४. मूर्ख पद्धति,३
५. विद्वत्पद्धति१९
६. मानशौर्य पद्धति३६
७. अर्थ पद्धति५२
८. दुर्जन पद्धति६७
९. सज्जन पद्धति८०
१०. परोपकार पद्धति९६
११. धैर्य पद्धति११२
१२. दैव पद्धति१२६
१३. कर्म पद्धति१४४
१४. परिशिष्ट१६१
(क) संस्कृत व्याख्या (उदाहरण रूप में)१६१
(ख) हिन्दी व्याख्या (उदाहरण रूप में)१६२
(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश१६२
(घ) शब्दार्थ (अकारादिक्रम में)१६४
(ङ) श्लोकानुक्रमणिका१६९