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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 318 में से

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पृष्ठ 56

अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्‌का स्तवन ४५
चारुबाहुं सुताम्रोष्ठं रत्नोज्ज्वलितकुण्डलम् । मनोहर हैं, जो सुन्दर भुजाओं और रुचिर अरुण
वृत्तकण्ठं सुपीनांसं सरसं श्रीधरं हरिम् ॥ ३१ अधरोंसे सुशोभित हैं, जिनके कुण्डल रत्नजटित होनेके
कारण जगमगा रहे हैं, कण्ठ वर्तुलाकार है और कंधे
सुकुमारमजं नित्यं नीलकुञ्चितमूर्धजम् । मांसल हैं, उन रसिकशेखर श्रीधर हरिको नमस्कार
उन्नतांसं महोरस्कं कर्णान्तायतलोचनम् ॥ ३२ है ॥ २८-३१ ॥
जो अजन्मा एवं नित्य होनेपर भी सुकुमारस्वरूप
हेमारविन्दवदनमिन्दिरायनमीश्वरम् । धारण किये हुए हैं, जिनके केश काले-काले और
सर्वलोकविधातारं सर्वपापहरं हरिम् ॥ ३३ घुंघराले हैं, कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल विशाल हैं, आँखें
कानोंतक फैली हुई हैं, मुखारविन्द सुवर्णमय कमलके
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वसत्त्वमनोरमम् । समान परम सुन्दर है, जो लक्ष्मीके निवासस्थान एवं
विष्णुमच्युतमीशानमनन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ३४ सबके शासक हैं, सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त
पापोंको हर लेनेवाले हैं, समग्र शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न
नतोऽस्मि मनसा नित्यं नारायणमनामयम् । और सभी जीवोंके लिये मनोरम हैं तथा जो सर्वव्यापी,
वरदं कामदं कान्तममन्तं सूनृतं शिवम् ॥ ३५ अच्युत, ईशान, अनन्त एवं पुरुषोत्तम हैं, वरदाता, कामपूरक,
कमनीय, अनन्त, मधुरभाषी एवं कल्याणस्वरूप हैं, उन
नमामि शिरसा विष्णो सदा त्वां भक्तवत्सल । निरामय भगवान् नारायण श्रीहरिको मैं सदा हृदयसे
अस्मिन्नेकार्णवे घोरे वायुस्कम्भितचञ्चले ॥ ३६ नमस्कार करता हूँ ॥ ३२-३५ ॥
भक्तवत्सल विष्णो ! मैं सदा आपको मस्तक झुकाकर
अनन्तभोगशयने सहस्रफणशोभिते । प्रणाम करता हूँ। इस भयंकर एकार्णवमें, जो प्रलयकालिक
विचित्रशयने रम्ये सेविते मन्दवायुना ॥ ३७ वायुकी प्रेरणासे विक्षुब्ध एवं चञ्चल हो रहा है, सहस्र
फणोंसे सुशोभित 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी
भुजपञ्जरसंसक्तकमलालयसेवितम् । विचित्र एवं रमणीय शय्यापर, जहाँ मन्द-मन्द वायु चल
इह त्वां मनसा सर्वमिदानीं दृष्टवानहम् ॥ ३८ रही है, आपके भुजपाशमें बँधी हुई श्रीलक्ष्मीजीसे आप
सेवित हैं; मैंने इस समय सर्वस्वरूप आपके रूपका
इदानीं तु सुदुःखार्तो मायया तव मोहितः । यहाँपर जी भरकर दर्शन किया है ॥ ३६-३८ ॥
एकोदके निरालम्बे नष्टस्थावरजङ्गमे ॥ ३९ इस समय आपकी मायासे मोहित होकर मैं
अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। दुःखरूपी पङ्कसे
शून्ये तमसि दुष्पारे दुःखपङ्के निरामये । भरे हुए, व्याधिपूर्ण एवं अवलम्बशून्य इस एकार्णवमें
शीतातपजरारोगशोकतृष्णादिभिः सदा ॥ ४० समस्त स्थावर-जङ्गम नष्ट हो चुके हैं। सब ओर
शून्यमय अपार अन्धकार छाया हुआ है। मैं इसके भीतर
पीडितोऽस्मि भृशं तात सुचिरं कालमच्युत । शीत, आतप, जरा, रोग, शोक और तृष्णा आदिके
शोकमोहग्रहग्रस्तो विचरन् भवसागरे ॥ ४१ द्वारा सदा चिरकालसे अत्यन्त कष्ट पा रहा हूँ। तात !
अच्युत ! इस भवसागरमें शोक और मोहरूपी ग्राहसे
इहाद्य विधिना प्राप्तस्तव पादाब्जसंनिधौ । ग्रस्त होकर भटकता हुआ आज मैं यहाँ दैववश आपके
एकार्णवे महाघोरे दुस्तरे दुःखपीडितः ॥ ४२ चरणकमलोंके निकट आ पहुँचा हूँ। इस महाभयानक
दुस्तर एकार्णवमें बहुत कालतक भटकते रहनेके कारण
चिरभ्रमपरिश्रान्तस्त्वामद्य शरणं गतः । दुःखपीड़ित एवं थका हुआ मैं आज आपकी शरणमें
प्रसीद सुमहामाय विष्णो राजीवलोचन ॥ ४३ आया हूँ। महामायी कमललोचन भगवन् ! विष्णो ! आप
मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३९-४३ ॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth