संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १० ] मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें तप एवं भगवान्की स्तुति करना ३९
अजं वरेण्यं जनदुःखनाशनं | मैं प्रणाम करता हूँ। जो अजन्मा, सबके वरणीय, जन-
गुरुं पुराणं पुरुषोत्तमं प्रभुम्। | समुदायके दुःखोंका नाश करनेवाले, गुरु, पुराण-
सहस्रसूर्यद्युतिमन्तमच्युतं | पुरुषोत्तम एवं सबके स्वामी हैं, सहस्रों सूर्योंके समान
जिनकी कान्ति है तथा जो अच्युतस्वरूप हैं, उन
नमामि भक्त्या हरिमाद्यमाधवम्॥ १० | आदिमाधव भगवान् विष्णुको मैं भक्तिभावसे प्रणाम
पुरस्कृतं पुण्यवतां परां गतिं | करता हूँ। जो पुण्यात्मा भक्तोंके ही समक्ष सगुण-
साकार रूपसे प्रकट होते हैं, सबकी परमगति हैं, भूमि,
क्षितीश्वरं लोकपतिं प्रजापतिम्। | लोक और प्रजाओंके पति हैं, 'पर' अर्थात् कारणोंके
परं पराणामपि कारणं हरिं | भी परम कारण हैं तथा तीनों लोकोंके कर्मोंके साक्षी
नमामि लोकत्रयकर्मसाक्षिणम्॥ ११ | हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो
भोगे त्वनन्तस्य पयोधौ सुरः | अनादि विधाता भगवान् पूर्वकालमें क्षीरसमुद्रके भीतर
पुरा हि शेते भगवाननादिकृत्। | 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीररूपी शय्यापर सोये थे,
क्षीरोदवीचीकणिकाम्बुनोक्षितं | क्षीरसिन्धुकी तरङ्गोंके जलकणोंसे अभिषिक्त होनेवाले
उन लक्ष्मीनिवास भगवान् केशवको मैं प्रणाम करता हूँ।
तं श्रीनिवासं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १२ | जिन्होंने नरसिंहस्वरूप धारण किया है, जो महान् देवता
यो नारसिंहं वपुरास्थितो महान् | हैं, मुर दैत्यके शत्रु हैं, मधु तथा कैटभ नामक दैत्योंका
सुरो मुरारिर्मधुकैटभान्तकृत्। | अन्त करनेवाले हैं और समस्त लोकोंकी पीड़ा दूर
समस्तलोकार्तिहरं हिरण्यकं | करनेवाले एवं हिरण्यगर्भ हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं
नमामि विष्णुं सततं नमामि तम्॥ १३ | सदा नमस्कार करता हूँ। जो अनन्त, अव्यक्त, इन्द्रियातीत,
सर्वव्यापी और अपने विभिन्न रूपोंमें स्वयं ही प्रतिष्ठित
अनन्तमव्यक्तमतीन्द्रियं विभुं | हैं तथा योगेश्वरगण जिनके चरणोंमें सदा ही मस्तक
स्वे स्वे हि रूपे स्वयमेव संस्थितम्। | झुकाते हैं, उन भगवान् जनार्दनको मैं भक्तिपूर्वक
योगेश्वरैरेव सदा नमस्कृतं | निरन्तर प्रणाम करता हूँ। जो आनन्दमय, एक (अद्वितीय),
नमामि भक्त्या सततं जनार्दनम्॥ १४ | रजोगुणसे रहित, ज्ञानस्वरूप, वृन्दा (लक्ष्मी)-के धाम
और योगियोंद्वारा पूजित हैं; जो अणुसे भी अत्यन्त अणु
आनन्दमेकं विरजं विदात्मकं | और वृद्धि तथा क्षयसे शून्य हैं, उन भक्तप्रिय भगवान्
वृन्दालयं योगिभिरेव पूजितम्। | विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ८-१५॥
अणोरणीयांसमवृद्धिमक्षयं | श्रीव्यासजी कहते हैं-वत्स! इस प्रकार स्तुति
नमामि भक्तप्रियमेश्वरं हरिम्॥ १५ | समाप्त होनेपर उस तीर्थमें तपस्या करनेवाले उन महाभाग
श्रीव्यास उवाच | मार्कण्डेयजीसे आकाशवाणीने कहा- 'ब्रह्मन्! क्यों क्लेश
इति स्तोत्रावसाने तं वागुवाचाशरीरिणी। | उठा रहे हो, तुम्हें जो भगवान् माधवका दर्शन नहीं हो
मार्कण्डेयं महाभागं तीर्थेऽनु तपसि स्थितम्॥ १६ | रहा है, वह तभीतक जबतक तुम समस्त तीर्थोंमें स्नान
किमर्थं क्लिश्यते ब्रह्मंस्त्वया यो नैव दृश्यते। | नहीं कर लेते' उसके यों कहनेपर महामति मार्कण्डेयजीने
माधवः सर्वतीर्थेषु यावन्न स्नानमाचरेः॥ १७ | समस्त तीर्थोंमें स्नान किया (परंतु जब फिर भी दर्शन
नहीं हुआ, तब उन्होंने आकाशवाणीको लक्ष्य करके
इत्युक्तः सर्वतीर्थेषु स्नात्वोवाच महामतिः। | कहा-) 'जो कार्य करनेसे समस्त तीर्थोंमें स्नान करना
सफल होता है, अथवा समस्त तीर्थोंमें स्नानका फल
कृत्वा कृत्वा सर्वतीर्थे स्नानं चैव कृतं भवेत्। | मिल जाता है, वह कार्य मुझे प्रसन्न होकर आप बतलाइये।
तद्वद त्वं मम प्रीत्या योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते॥ १८ | आप जो भी हों, आपको नमस्कार है' ॥ १६-१८॥
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