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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 318 में से

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पृष्ठ 303

२९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६५
पैंसठवाँ अध्याय
भगवत्सम्बन्धी तीर्थ और उन तीर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले भगवान्‌के नाम
भरद्वाज उवाच | भरद्वाजजी बोले—सूतजी! अब मैं आपसे भगवान्
त्वत्तो हि श्रोतुमिच्छामि गुह्यक्षेत्राणि वै हरेः। | विष्णुके गुप्त तीर्थोंका और उन तीर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले
नामानि च सुगुह्यानि वद पापहराणि च॥ १ | भगवान्‌के गुप्त नामोंका वर्णन सुनना चाहता हूँ; कृपया
| आप उन पापनाशक नामोंका मेरे समक्ष वर्णन
सूत उवाच | कीजिये॥ १॥
मन्दरस्थं हरिं देवं ब्रह्मा पृच्छति केशवम्। | सूतजी बोले—एक समय मन्दराचलपर विराजमान
भगवन्तं देवदेवं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २ | शंख-चक्र-गदाधारी देवदेव भगवान् विष्णुसे श्रीब्रह्माजीने
| पूछा॥ २॥
ब्रह्मोवाच |
केषु केषु च क्षेत्रेषु द्रष्टव्योऽसि मया हरे। | ब्रह्माजी बोले—सुरश्रेष्ठ! हरे! मुझे तथा मुक्ति चाहनेवाले
भक्तैरन्यैः सुरश्रेष्ठ मुक्तिकामैर्विशेषतः॥ ३ | अन्यान्य भक्तोंको किन-किन क्षेत्रोंमें जाकर आपका
| विशेषरूपसे दर्शन करना चाहिये। जगत्पते! कमललोचन!
यानि ते गुह्यनामानि क्षेत्राणि च जगत्पते। | आपके जो-जो गुप्त तीर्थ और नाम हैं, उन्हें मैं आपके
तान्यहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः पद्मायतेक्षण॥ ४ | ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। सुरेश्वर! मनुष्य आलस्य
किं जपन् सुगतिं याति नरो नित्यमतन्द्रितः। | त्यागकर प्रतिदिन किसका जप करनेसे सद्गतिको प्राप्त हो
त्वद्भक्तानां हितार्थाय तन्मे वद सुरेश्वर॥ ५ | सकता है? अपने भक्तोंका हित-साधन करनेके लिये यह
| बात आप हमें बताइये॥ ३-५॥
श्रीभगवानुवाच |
शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् गुह्यनामानि मेऽधुना। | श्रीभगवान् बोले—ब्रह्मन्! तुम सावधान होकर
क्षेत्राणि चैव गुह्यानि तव वक्ष्यामि तत्त्वतः॥ ६ | सुनो; मेरे जो गुह्य नाम और क्षेत्र हैं, उन्हें मैं ठीक-
| ठीक बता रहा हूँ॥ ६॥
कोकामुखे तु वाराहं मन्दरे मधुसूदनम्। | कोकामुख-क्षेत्रमें मेरे वाराहस्वरूपका, मन्दराचलपर
अनन्तं कपिलद्वीपे प्रभासे रविनन्दनम्॥ ७ | मधुसूदनका, कपिलद्वीपमें अनन्तका, प्रभासक्षेत्रमें सूर्यनन्दनका,
माल्योदपाने वैकुण्ठं महेन्द्रे तु नृपात्मजम्। | माल्योदपानतीर्थमें भगवान् वैकुण्ठका, महेन्द्रपर्वतपर
ऋषभे तु महाविष्णुं द्वारकायां तु भूपतिम्॥ ८ | राजकुमारका, ऋषभतीर्थमें महाविष्णुका, द्वारकामें भूपाल
पाण्डुसह्ये तु देवेशं वसुरूढे जगत्पतिम्। | श्रीकृष्णका, पाण्डुसह्य पर्वतपर देवेशका, वसुरूढतीर्थमें
वल्लीवटे महायोगं चित्रकूटे नराधिपम्॥ ९ | जगत्पतिका, वल्लीवटमें महायोगका, चित्रकूटमें राजा
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