संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४७ ] श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७९
नानादेशादथायाता जनकस्य निवेशनम्। इनके जानेसे पूर्व ही वहाँ सीतासे विवाह करनेकी
राजपुत्रा महावीर्याः पूर्वं सीताभिकाङ्क्षिणः ॥ १०१ इच्छावाले अनेक महान् पराक्रमी राजकुमार नाना देशोंसे
तान् दृष्ट्वा पूजयित्वा तु जनकश्च यथार्हतः । जनकके यहाँ पधारे थे। उन सबको आया देख राजा
यत्सीतायाः समुत्पन्नं धनुर्माहेश्वरं महत् ॥ १०२ जनकने उनका यथोचित सत्कार किया तथा जो सीताके
स्वयंवरके लिये ही प्रकट हुआ था, उस महान् माहेश्वर
अर्चितं गन्धमालाभी रम्यशोभासमन्विते । धनुषका चन्दन और पुष्प आदिसे पूजन करके उसे
रङ्गे महति विस्तीर्णे स्थापयामास तद्धनुः ॥ १०३ रमणीय शोभासे सम्पन्न सुविस्तृत रङ्गमञ्चपर लाकर
रखवाया ॥ १०१-१०३ ॥
उवाच च नृपान् सर्वान्स्तोदोच्चैर्जनको नृपः । तब राजा जनकने वहाँ पधारे हुए उन समस्त राजाओंके
आकर्षणादिदं येन धनुर्भग्नं नृपात्मजाः ॥ १०४ प्रति उच्च स्वरसे कहा- 'राजकुमारो ! जिसके खींचनेसे
तस्येयं धर्मतो भार्या सीता सर्वाङ्गशोभना । यह धनुष टूट जायगा, यह सर्वाङ्गसुन्दरी सीता उसीकी
इत्येवं श्राविते तेन जनकेन महात्मना ॥ १०५ धर्मपत्नी हो सकती है।' महात्मा जनकके द्वारा ऐसी बात
सुनायी जानेपर वे नरेशगण क्रमशः उस धनुषको ले-
क्रमादादाय ते तत्तु सज्जीकर्तुमथाभवन् । लेकर चढ़ानेका प्रयत्न करने लगे; परंतु बारी-बारीसे उस
धनुषा ताडिताः सर्वे क्रमात्तेन महीपते ॥ १०६ धनुषद्वारा ही झटके खाकर काँपते हुए वे दूर गिर जाते
विधूय पतिता राजन् विलज्जास्तत्र पार्थिवाः । थे। राजन्! इससे उन सभी भूपालोंको वहाँ बड़ी लज्जा
तेषु भग्नेषु जनकस्तद्धनुस्त्र्यम्बकं नृप ॥ १०७ हुई। नरेश्वर ! उन सबके निराश हो जानेपर वीर राजा
संस्थाप्य स्थितवान् वीरो रामागमनकाङ्क्षया । जनक उस शिव-धनुषको यथास्थान रखवाकर श्रीरामके
विश्वामित्रस्ततः प्राप्तो मिथिलाधिपतेर्गृहम् ॥ १०८ आगमनकी प्रतीक्षा में वहाँ ही ठहरे रहे। इतने में विश्वामित्रजी
मिथिलानरेशके राजभवनमें आ पहुँचे ॥ १०४-१०८ ॥
जनकोऽपि च तं दृष्ट्वा विश्वामित्रं गृहागतम् । जनकने श्रीराम, लक्ष्मण तथा शिष्योंसे युक्त
रामलक्ष्मणसंयुक्तं शिष्यैश्चाभिगतं तदा ॥ १०९ विश्वामित्रजीको अपने भवनमें आया देख उस समय
तं पूजयित्वा विधिवत्प्राज्ञं विप्रानुयायिनम् । उनकी विधिवत् पूजा की। फिर ब्राह्मणका अनुसरण
रामं रघुपतिं चापि लावण्यादिगुणैर्युतम् ॥११० करनेवाले तथा लावण्य आदि गुणोंसे लक्षित रघुवंशनाथ
शीलाचारगुणोपेतं लक्ष्मणं च महामतिम्। बुद्धिमान् श्रीराम एवं शील-सदाचारादि गुणोंसे युक्त
पूजयित्वा यथान्यायं जनकः प्रीतमानसः ॥ १११ महामति लक्ष्मणका भी यथायोग्य पूजन करके जनकजी
मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सोनेके सिंहासनपर
हेमपीठे सुखासीनं शिष्यैः पूर्वापरैर्वृतम्। सुखपूर्वक बैठकर छोटे-बड़े शिष्योंसे घिरे हुए मुनिवर
विश्वामित्रमुवाचाथ किं कर्तव्यं मयेति सः ॥ ११२ विश्वामित्रसे वे बोले- 'भगवन् ! अब मुझे क्या करना
चाहिये' ॥ १०९-११२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजा जनककी यह बात
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनिः प्राह महीपतिम् । सुनकर मुनिने उनसे कहा- 'महाराज ! ये राजा राम
एष रामो महाराज विष्णुः साक्षान्महीपतिः ॥ ११३ साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। (तीनों) लोकोंकी रक्षाके
रक्षार्थं विष्टपानां तु जातो दशरथात्मजः । लिये ये दशरथके पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं; अतः देवकन्याके
अस्मै सीतां प्रयच्छ त्वं देवकन्यामिव स्थिताम् ॥ ११४ समान सुशोभित होनेवाली सीताका ब्याह तुम इन्हींके
अस्या विवाहे राजेन्द्र धनुर्भङ्गोमुदीरितम् । साथ कर दो। परंतु राजेन्द्र ! नराधिप ! तुमने सीताके विवाहमें
तदानय भवधनुरर्चयस्व जनाधिप ॥ ११५ धनुष तोड़नेकी शर्त रखी है; अतः अब उस शिवधनुषको
लाकर यहाँ उसकी अर्चना करो' ॥ ११३-११५ ॥
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