संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६७
सजलं हेमकलशं गृहीत्वोत्थाय भक्तितः। | इस प्रकार आज्ञा देनेपर स्वयं राजा बलि जलसे भरे हुए
यावत्स वामनकरे तोयं दातुमुपस्थितः॥ ३५ | सुवर्णकलशको लेकर भक्तिपूर्वक खड़े हो गये और
| ज्यों ही वामनजीके हाथमें जल देनेको उद्यत हुए, त्यों
तावच्छुक्रः कलशगो जलधारां रुरोध ह। | ही शुक्राचार्यने [योगबलसे] कलशमें घुसकर गिरती
ततश्च वामनः क्रुद्धः पवित्राग्रेण सत्तम॥ ३६ | हुई जलधारा रोक दी। सत्तम! तब वामनजीने क्रुद्ध
| होकर पवित्र (कुश)-के अग्रभागसे कलशके छेदमें
उदके कलशद्वारि तच्छुक्राक्षिमवेधयत्। | जल निकलनेके मार्गपर स्थित हुए शुक्राचार्यकी एक
ततो व्यपगतः शुक्नो विद्धैकाक्षो नरोत्तम॥ ३७ | आँख छेद डाली। नरोत्तम! एक आँख छिद जानेपर
| शुक्राचार्य उसमेंसे निकल भागे॥ ३४-३७॥
तोयधारा निपतिता वामनस्य करे पुनः। |
करे निपतिते तोये वामनो ववृधे क्षणात्॥ ३८ | तत्पश्चात् वामनजीके हाथमें जलकी धारा गिरी।
| हाथपर जल पड़ते ही वामनजी क्षणभरमें ही बहुत बड़े
पादेनैकेन विक्रान्ता तेनैव सकला मही। | हो गये। सत्तम! उन्होंने एक पगसे यह सम्पूर्ण पृथ्वी नाप
अन्तरिक्षं द्वितीयेन द्यौस्तृतीयेन सत्तम॥ ३९ | ली, द्वितीय पगसे अन्तरिक्षलोक तथा तृतीय पगसे
| स्वर्गलोकको आक्रान्त कर लिया। फिर अनेक दानवोंका
अनेकान् दानवान् हत्वा हृत्वा त्रिभुवनं बलेः। | संहार करके बलिसे त्रिभुवनका राज्य छीन लिया और
पुरंदराय त्रैलोक्यं दत्त्वा बलिमुवाच ह॥ ४० | यह त्रिलोकी इन्द्रको अर्पितकर पुनः बलिसे कहा—
यस्मात्ते भक्तितो दत्तं तोयमद्य करे मम॥ | 'तुमने भक्तिपूर्वक आज मेरे हाथमें संकल्पका जल अर्पित
तस्मात्ते साम्प्रतं दत्तं पातालतलमुत्तमम्॥ ४१ | किया है, इसलिये इस समय मैंने तुम्हें उत्तम पाताललोकका
| राज्य दिया। महाभाग! वहाँ जाकर तुम मेरे प्रसादसे राज्य
तत्र गत्वा महाभाग भुङ्क्ष्व त्वं मत्प्रसादतः। | भोगो; वैवस्वत मन्वन्तर व्यतीत हो जानेपर तुम पुनः
वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते पुनरिन्द्रो भविष्यसि॥ ४२ | इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होओगे'॥ ३८-४२॥
प्रणाम्य च ततो गत्वा तलं भोगमवाप्तवान्॥ ४३ |
| तब बलिने भगवान्को प्रणाम करके पातालतलमें
शुक्रोऽपि स्वर्गमारुह्य प्रसादाद्वामनस्य वै। | जाकर वहाँ उत्तम भोगोंको प्राप्त किया। राजन्! शुक्राचार्य
समागतस्त्रिभुवनं राजन् देवसमन्वितः॥ ४४ | भी भगवान् वामनकी कृपासे त्रिभुवनकी राजधानी स्वर्गमें
| आकर सब देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। जो
यः स्मरेत्प्रातरुत्थाय वामनस्य कथामिमाम्। | मनुष्य प्रातःकाल उठकर भगवान् वामनकी इस कथाका
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ४५ | स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें
इत्थं पुरा वामनरूपमास्थितो | प्रतिष्ठित होता है। नृप! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान्
हरिर्बलेर्हृत्य जगत्त्रयं नृप। | विष्णुने वामनरूप धारणकर त्रिभुवनका राज्य बलिसे ले
कृत्वा प्रसादं च दिवौकसाम्पते- | लिया और उसे कृपापूर्वक देवराज इन्द्रको अर्पित कर
र्दत्त्वा त्रिलोकं स ययौ महोदधिम्॥ ४६ | दिया। तत्पश्चात् वे क्षीरसागरको चले गये॥ ४३-४६॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे वामनप्रादुर्भावे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वामनावतार' विषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
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