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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 318 में से

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पृष्ठ 16

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३
कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ। महर्षे! साधुशिरोमणे! मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके जिस
तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ४ कालस्वरूपका वर्णन किया था, उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी
अन्येषां चैव भूतानां चराणामचराश्च ये। तथा दूसरे भी जो पृथ्वी, पर्वत और समुद्र आदि पदार्थ
भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ५ एवं चराचर जीव हैं, उनकी आयुका परिमाण नियत
संख्याज्ञानं च ते वच्मि मनुष्याणां निबोध मे। किया जाता है। अब मैं आपसे मनुष्योंकी 'काल-गणना'
अष्टादश निमेषास्तु काष्ठैका परिकीर्तिता॥ ६ का ज्ञान बता रहा हूँ, सुनिये॥ १-५१/२॥
काष्ठास्त्रिंशत्कला ज्ञेया कलास्त्रिंशन्मुहूर्तकम्। अठारह निमेषोंकी एक 'काष्ठा' कही गयी है, तीस
त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्॥ ७ काष्ठाओंकी एक 'कला' समझनी चाहिये तथा तीस
अहोरात्राणि तावन्ति मासपक्षद्वयात्मकः। कलाओंका एक 'मुहूर्त' होता है। तीस मुहूर्तोंका एक
तैः षड्भिरयनं मासैर्द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे॥ ८ मानव 'दिन-रात' माना गया है। उतने ही (तीस ही)
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्। दिन-रात मिलकर एक 'मास' होता है। इसमें दो पक्ष
अयनद्वितयं वर्षं मर्त्यानामिह कीर्तितम्॥ ९ होते हैं। छः महीनोंका एक 'अयन' होता है। अयन
नृणां मासः पितॄणां तु अहोरात्रमुदाहृतम्। दो हैं—'दक्षिणायन' और 'उत्तरायण'। दक्षिणायन
वस्वादीनामहोरात्रं मानुषो वत्सरः स्मृतः॥ १० देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन। दो अयन
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु युगं त्रेतादिसंज्ञितम्। मिलकर मनुष्योंका एक 'वर्ष' कहा गया है। मनुष्योंका
चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११ एक मास पितरोंका एक दिन-रात बताया गया है और
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्। मनुष्योंका एक वर्ष वसु आदि देवताओंका एक दिन-
दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२ रात कहा गया है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंका त्रेता
तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्र विधीयते। आदि नामक चतुर्युग होता है। उसका विभाग आपलोग
संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३ मुझसे समझ लें॥ ६-११॥
संध्यासंध्यांशयोर्मध्ये यः कालो वर्तते द्विज। पुराण-तत्त्ववेत्ताओंने कृत आदि युगोंका परिमाण
युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञकः॥ १४ क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चेति चतुर्युगम्। बतलाया है। ब्रह्मन्! प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ
प्रोच्यते तत्सहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसं द्विज॥ १५ वर्षोंकी 'संध्या' कही गयी है और युगके पीछे उतने
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश। ही परिमाणवाले 'संध्यांश' होते हैं। विप्र! संध्या और
भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६ संध्यांशके बीचका जो काल है, उसे सत्ययुग और
सप्तर्षयस्तु शक्रोऽथ मनुस्तत्सूनवोऽपि ये। त्रेता आदि नामोंसे प्रसिद्ध युग समझना चाहिये।
एककालं हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७ 'सत्ययुग', 'त्रेता', 'द्वापर' और 'कलि'-ये चार युग
चतुर्युगानां संख्या च साधिका ह्येकसप्ततिः। मिलकर 'चतुर्युग' कहलाते हैं। द्विज! एक हजार
मन्वन्तरं मनोः कालः शक्रादीनामपि द्विज॥ १८ चतुर्युग मिलकर 'ब्रह्माका एक दिन' होता है। ब्रह्मन्!
ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत
परिमाण सुनिये। सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनु-पुत्र—
ये पूर्व कल्पानुसार एक ही समय उत्पन्न किये जाते
हैं तथा इनका संहार भी एक ही साथ होता है।
ब्रह्मन्! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक काल एक
'मन्वन्तर' कहलाता है। यही मनु तथा इन्द्रादि देवोंका

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