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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 318 में से

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पृष्ठ 135

१२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४
पादपीठं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैर्निघर्षितम्। नहलाता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। जो भगवान्‌के
उष्णाम्बुना च प्रक्षाल्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३ पादपीठ (पैर रखनेके पीढ़े, चौकी या चरणपादुका)-
कुशपुष्पोदकैः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्। को भक्तिपूर्वक बिल्वपत्रसे रगड़कर गरम जलसे धोता
रत्नोदकेन सावित्रं कौबेरं हेमवारिणा। है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुश और पुष्पमिश्रित
नरसिंहं तु संस्त्राप्य कर्पूरागुरुवारिणा ॥ १४ जलसे भगवान्‌को स्नान कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त
होता है, रत्नयुक्त जलसे स्नान करानेपर सूर्यलोकको और
इन्द्रलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरे वसेत्। सुवर्णयुक्त जलसे नहलानेपर कुबेरलोकको प्राप्त करता
पुण्योदकेन गोविन्दं स्नाप्य भक्त्या नरोत्तम ॥ १५ है। जो कपूर और अगुरुमिश्रित जलसे भगवान् नृसिंहको
नहलाता है, वह पहले इन्द्रलोकमें सुखोपभोग करके
सावित्रं लोकमासाद्य विष्णुलोके महीयते। फिर विष्णुधाममें निवास करता है। जो पुरुषश्रेष्ठ तीर्थोंके
वस्त्राभ्यामर्चनं भक्त्या परिधाप्य हरिं हरेः ॥ १६ पवित्र जलसे गोविन्दको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है,
वह आदित्यलोकको प्राप्त करके पुनः विष्णुलोकमें पूजित
सोमलोके रमित्वा च विष्णुलोके महीयते। होता है। जो भक्तिपूर्वक भगवान्‌को युगल वस्त्र पहनाकर
कुङ्कुमागुरुश्रीखण्डकर्दमैरच्युताकृतिम् ॥ १७ उनकी पूजा करता है, वह चन्द्रलोकमें सुखभोग करके
आलिप्य भक्त्या राजेन्द्र कल्पकोटिं वसेद्दिवि। पुनः विष्णुधाममें सम्मानित होता है॥ ११-१६१/२॥
मल्लिकामालतीजातिकेतक्यशोकचम्पकैः ॥ १८ राजेन्द्र! जो कुङ्कुम (केसर), अगुरु और चन्दनके
पुंनागनागबकुलैः पद्मैरुत्पलजातिभिः। अनुलेपनसे भगवान्‌के विग्रहको भक्तिपूर्वक अनुलिप्त
तुलसीकरवीरैश्च पालाशैः सानुकुम्बकैः ॥ १९ करता है, वह करोड़ों कल्पोंतक स्वर्गलोकमें निवास
एतैरन्यैश्च कुसुमैः प्रशस्तैरच्युतं नरः। करता है। जो मनुष्य मल्लिका, मालती, जाती, केतकी,
अशोक, चम्पा, पुंनाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी),
अर्चयेद्दशसुवर्णस्य प्रत्येकं फलमाप्नुयात् ॥ २० उत्पल जातिके कमल, तुलसी, कनेर, पलाश-इनसे
मालां कृत्वा यथालाभमेतेषां विष्णुमर्चयेत्। तथा अन्य उत्तम पुष्पोंसे भगवान्‌की पूजा करता है, वह
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥ २१ प्रत्येक पुष्पके बदले दस सुवर्ण मुद्रा दान करनेका फल
प्राप्त करता है। जो यथाप्राप्त उपर्युक्त पुष्पोंकी माला
दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके स मोदते। बनाकर उससे भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह
नरसिंहं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैरखण्डितैः ॥ २२ सैकड़ों और हजारों करोड़ कल्पोंतक दिव्य विमानपर
आरूढ हो विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो छिद्ररहित
निश्छिद्रैः पूजयेद्यस्तु तुलसीभिः समन्वितम्। अखण्डित बिल्वपत्रों और तुलसीदलोंसे भक्तिपूर्वक
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः ॥ २३ श्रीनृसिंहका पूजन करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त
काञ्चनेन विमानेन विष्णुलोके महीयते। हो, सब प्रकारके भूषणोंसे भूषित होकर सोनेके विमानपर
माहिषाख्यं गुग्गुलं च आज्ययुक्तं सशर्करम् ॥ २४ आरूढ हो विष्णुलोकमें सम्मान पाता है॥ १७-२३१/२॥
धूपं ददाति राजेन्द्र नरसिंहस्य भक्तिमान्। राजेन्द्र! जो माहिष गुग्गुल, घी और शक्करसे तैयार की
धूपितैः सर्वदिग्भ्यस्तु सर्वपापविवर्जितः ॥ २५ हुई धूपको भगवान् नरसिंहके लिये भक्तिपूर्वक अर्पित
करता है, वह सब दिशाओंमें धूप करनेसे सब पापोंसे रहित
अप्सरोगणसंकीर्णविमानेन विराजते। हो अप्सराओंसे पूर्ण विमानद्वारा वायुलोकमें विराजमान होता
वायुलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरं व्रजेत् ॥ २६ है और वहाँ आनन्दोपभोगके पश्चात् पुनः विष्णुधाममें जाता
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