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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 318 में से

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पृष्ठ 132

अध्याय ३३ ] भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल १२१
कर्माण्यान्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रियतराणि वै। | यद्यपि भगवान्‌को अत्यन्त प्रिय लगनेवाले अन्य कर्म भी
तथापि त्वं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥ ५९ | हैं ही, तथापि महाभाग ! आप इन्हीं दो कर्मोंमें सदा सर्वथा
| लगे रहते हैं। नरेश! यदि आपको इनसे होनेवाला महान्
सर्वात्मना महापुण्यं जनेश विदितं तव। | पुण्यरूप फल ज्ञात हो और वह छिपानेयोग्य न हो तथा यदि
तद्ब्रूहि यद्यगुह्यं च प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥ ६० | आपका मुझपर प्रेम हो तो अवश्य ही उस फलको मुझे
| बताइये ॥ ५६—६०॥
जयध्वज उवाच | जयध्वज बोले- विप्रवर ! इस विषयमें आप मेरा
| ही पूर्वजन्मका चरित्र सुनें। मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका
शृणुष्व विप्रशार्दूल ममैव चरितं पुरा ॥ ६१ | स्मरण है, इसीसे मैं सब जानता हूँ। मेरा चरित्र श्रोताओंको
| आश्चर्यमें डालनेवाला है। विप्रेन्द्र ! पूर्वजन्ममें मैं रैवत
जातिस्मरत्वाज्जानामि श्रोतृणां विस्मयावहम्। | नामका ब्राह्मण था। जिनको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं
पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र रैवतो नाम वाडवः ॥ ६२ | है, उनसे भी मैं सदा ही यज्ञ कराता था और अनेकों
| गाँवोंका पुरोहित था। इतना ही नहीं, मैं दूसरोंकी चुगली
अयाज्ययाजकोऽहं वै सदैव ग्रामयाजकः। | खानेवाला, निर्दय और नहीं बेचने योग्य वस्तुओंका
पिशुनो निष्ठुरश्चैव अपण्यानां च विक्रयी ॥ ६३ | विक्रय करनेवाला था। निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेके
| कारण मेरे बान्धवोंने मुझे त्याग दिया था। मैं महान् पापी
निषिद्धकर्माचरणात् परित्यक्तः स्वबन्धुभिः। | और सदा ही ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला था। परायी स्त्री
महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६४ | और पराये धनका लोभी था, प्राणियोंकी हिंसा किया
| करता था। सदा ही मद्य पीता और ब्राह्मणोंसे द्वेष रखता
परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः। | था। इस प्रकार मैं प्रतिदिन पापमें लगा रहता और बहुधा
मद्यपानरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६५ | लूटपाट भी करता था ॥ ६१-६५ १/२ ॥
| एक दिन रातमें स्वेच्छाचारिताके कारण मैं कुछ
एवं पापरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत्। | ब्राह्मण-पत्नियोंको पकड़कर एक सूने ठाकुर-मन्दिरमें
कदाचित् कामचारोऽहं गृहीत्वा ब्राह्मणस्त्रियः ॥ ६६ | ले गया। उस मन्दिरमें कभी पूजा नहीं होती थी। [यों
| ही खण्डहर-सा पड़ा रहता था।] वहाँ स्त्रियोंके साथ
शून्यं पूजादिभिर्विष्णोर्मन्दिरं प्रामवान्निशि। | रमण करनेकी इच्छासे मैंने अपने वस्त्रके किनारेसे उस
स्ववस्त्रप्रान्ततो ब्रह्मन् कियदंशः स मार्जितः ॥ ६७ | मन्दिरका कुछ भाग बुहारकर साफ किया और हे
| द्विजोत्तम! [प्रकाशके लिये] दीप जलाकर रख दिया।
प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थाय द्विजोत्तम। | [यद्यपि मैंने अपनी पाप-वासना पूर्ण करनेके लिये ही
तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् ॥ ६८ | मन्दिरमें झाडू लगायी और दीप जलाया था, तथापि]
| उससे भी मेरा सारा पापकर्म नष्ट हो गया। ब्राह्मण ! इस
एवं स्थितं विष्णुगृहे मया भोगेच्छया द्विज। | प्रकार जब मैं उस विष्णुमन्दिरमें भोगकी इच्छासे ठहरा
तदैव दीपकं दृष्ट्वा आगताः पुरपालकाः ॥ ६९ | हुआ था, उसी समय वहाँ दीपक देखकर नगरके रक्षक
| आ पहुँचे और यह कहकर कि 'यह किसी शत्रु का दूत
चौर्यार्थं परदूतोऽयमित्युक्त्वा मामपातयन्। | है, यहाँ चोरी करने आया है,' उन्होंने मुझे पृथ्वीपर गिरा
खड्गेन तीक्ष्णधारेण शिरश्छित्त्वा च ते गताः ॥ ७० | दिया तथा तीखी धारवाली तलवारसे मेरा मस्तक काटकर
| वे चले गये। तब मैं भगवान्‌के पार्षदोंसे युक्त दिव्य
दिव्यं विमानमारुह्य प्रभुदाससमन्वितम्। | विमानपर आरूढ़ हो, गन्धर्वोंद्वारा अपना यशोगान सुनता
गन्धर्वैर्गीयमानोऽहं स्वर्गलोकं तदा गतः ॥ ७१ | हुआ स्वर्गलोकको चला गया ॥ ६६-७१ ॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth