संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ श्रीमन्नरसिंहपुराण [अध्याय ३१
क्रूरनिजजननीगोकुलपालकचतुर्भुजशङ्खचक्र- | जो अपने प्रिय भक्त अक्रूर, माता देवकी और गोकुलके
गदापद्मतुलसीनवदलदामहारकेयूरकटकमुकुटा- | पालक हैं तथा जो अपनी चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र,
लंकृतः । सुनन्दनादिभागवतोपासितविश्वरूपः । | गदा, पद्म धारण किये नूतन तुलसीदलकी माला, मुक्ताहार,
पुराणपुरुषोत्तमः । उत्तमश्लोकः । लोकावासो | केयूर, कड़ा और मुकुट आदिसे विभूषित हैं, सुनन्दन
वासुदेवः । श्रीदेवकीजठरसम्भूतः । भूतपतिविरञ्चि- | आदि भगवद्भक्त जिन विश्वरूप हरिकी उपासना करते
नतचरणारविन्दः । वृन्दावनकृतकेलिगोपिकाजन- | हैं, जो पुराण-पुरुषोत्तम हैं, पुण्ययशवाले हैं तथा समस्त
श्रमापहः । सततं सम्पादितसुजनकामः । कुन्दनिभ- | लोकोंके आवास-स्थान वासुदेव हैं, जो देवकीके उदरसे
शङ्खधरमिन्दुनिभवक्त्रं सुन्दरसुदर्शनमुदारतरहासं | प्रकट हुए हैं, भूतनाथ शिव तथा ब्रह्माजीने जिनके
विद्वज्जनवन्दितमिदं ते रूपमतिहृद्यमखिलेश्वरं | चरणारविन्दोंपर मस्तक झुकाया है, जो वृन्दावनमें की
नतोऽस्मि । | गयी लीलासे थकी हुई गोपियोंके श्रमको दूर करनेवाले
हैं, सज्जनोंके मनोरथोंको जो सर्वदा पूर्ण किया करते हैं,
स्थानाभिकामी तपसि स्थितोऽहं | ऐसी महिमावाले हे सर्वेश्वर ! जो कुन्दके समान उज्ज्वल
त्वां दृष्टवान् साधुमुनीन्द्रगुह्यम् । | शङ्ख धारण करते हैं, जिसका चन्द्रमाके समान सुन्दर
काचं विचिन्वन्निव दिव्यरत्नं | मुख है, सुन्दर नेत्र हैं तथा अत्यन्त मनोहर मुसकान है,
स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरान्न याचे ॥ ९० | ऐसे अत्यन्त हृदयहारी आपके इस रूपको, जो ज्ञानियोंद्वारा
वन्दित है, मैं प्रणाम करता हूँ।
मैं उत्तम स्थान प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्यामें
अपूर्वदृष्टे तव पादपद्मे | प्रवृत्त हुआ और बड़े-बड़े मुनीश्वरोंके लिये भी जिनका
दृष्ट्वा दृढं नाथ नहि त्यजामि । | दर्शन पाना असम्भव है, उन्हीं आप परमेश्वरका दर्शन
कामान् न याचे स हि कोऽपि मूढो | पा गया—ठीक उसी तरह, जैसे काँचकी खोज करनेवाला
यः कल्पवृक्षात् तुषमात्रमिच्छेत् ॥ ९१ | कोई मनुष्य भाग्यवश दिव्य रत्न हस्तगत कर ले। स्वामिन् !
मैं कृतार्थ हो गया, अब मैं कोई वर नहीं माँगता। हे
त्वां मोक्षबीजं शरणं प्रपन्नः | नाथ! जिनका दर्शन अपूर्व है—पहले कभी उपलब्ध
शक्नोमि भोक्तुं न बहिःसुखानि । | नहीं हुआ है, उन आपके चरणकमलोंका दर्शन पाकर
रत्नाकरे देव सति स्वनाथे | अब मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता। मैं अब भोगोंकी याचना
विभूषणं काचमयं न युक्तम् ॥ ९२ | नहीं करूँगा; ऐसा कोई मूर्ख ही होगा, जो कल्पवृक्षसे
केवल भूसी पाना चाहेगा ? देव ! आज मैं मोक्षके कारणभूत
आप परमेश्वरकी शरणमें आ पड़ा हूँ, अब बाह्य विषय-
अतो न याचे वरमीश युष्मत्- | सुखोंको मैं नहीं भोग सकता। जब रत्नोंकी खान समुद्र
पादाब्जभक्तिं सततं ममास्तु । | अपना मालिक हो जाय, तब काँचका भूषण पहनना
इमं वरं देववर प्रयच्छ | कभी उचित नहीं हो सकता। अतः ईश ! अब मैं दूसरा
पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥ ९३ | कोई वर नहीं माँगता; आपके चरण-कमलोंमें मेरी सदा
भक्ति बनी रहे, देववर ! मुझे यही वर दीजिये। मैं
बारंबार आपसे यही प्रार्थना करता हूँ ॥ ९०-९३ ॥
श्रीसूत उवाच | श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार अपने दर्शनमात्रसे
इत्यात्मसंदर्शनलब्धदिव्य- | दिव्य ज्ञान प्राप्त करके स्तुति करते हुए ध्रुवको देखकर
ज्ञानं गदन्तं भगवाञ्जगाद ॥ ९४ | भगवान्ने उससे कहा ॥ ९४ ॥
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