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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 304 में से

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पृष्ठ 91
  1. धरोहर के रूप में रखी सम्पत्ति को अपनी मान लेना।
  2. लुक-छिपकर चोरी से प्रयोग करना।
  3. ऋण लेकर या बन्धक रखकर सम्पत्ति को न लौटाना तथा
  4. मूल-स्वामी की अनुपस्थिति (बाहर गये होने पर) में प्रयोग करना।
    तथारूढविवादस्य प्रेतस्य व्यवहारिणः।
    पुत्रेण सोऽर्थः संशोध्यो न तं भोगपदं नयेत् ॥ 93 ॥
    अभियोग के निपटने से पूर्व वादी अथवा प्रतिवादी की मृत्यु हो जाने पर
    उनके पुत्र को अभियोग को आगे बढ़ाना (पैरवी करनी) चाहिए। विवादित सम्पत्ति
    का संशोधन किये बिना क़ब्ज़े को स्वामित्व का आधार नहीं मान लेना चाहिए।
    सन्तोऽपि न प्रमाणं स्युर्मृते धन्विनि साक्षिणः।
    अन्यत्र श्राविताद्यस्मात् स्वयमासन्नमृत्युना ॥ 94 ॥
    यदि व्यक्ति ने मरते समय अपने आस-पास बैठे व्यक्तियों की उपस्थिति में
    किसी के ऋण को चुकता करने की कोई बात कही है, तो उसकी मृत्यु के उपरान्त
    भी साक्षियों का साक्ष्य वैध होता है, अन्यथा ऋणकर्ता द्वारा किसी प्रकार की कोई
    स्वीकृति न किये जाने पर उसके जीवित रहते अथवा मर जाने पर साक्षियों के
    साक्ष्य का कोई महत्त्व नहीं होता; क्योंकि यदि सम्बद्ध व्यक्ति ने कुछ कहा ही नहीं,
    तो साक्षी या साक्षियों का साक्ष्य अपनी ओर से जोड़ा माना जायेगा। ऐसा साक्ष्य
    कभी सत्य एवं प्रामाणिक नहीं कहला सकता।
    न हि प्रत्यर्थिनि प्रेते प्रमाणं साक्षिणां वचः।
    साक्षिमत्कारणं तत्र प्रमाणं तत्र जीवतः ॥ 95 ॥
    साक्षियों का साक्ष्य सम्बद्ध व्यक्ति के जीवनकाल तक, अर्थात् उसके जीवित
    रहने तक ही मान्य रहता है। सम्बद्ध व्यक्ति के दिवंगत हो जाने पर उस व्यक्ति के
    कथन की पुष्टि एवं प्रामाणिकता के लिए साक्ष्य की कोई भूमिका नहीं रहती।
    श्रावितश्चातुरेणापि यस्त्वर्थो धर्मसंहितः।
    मृतेऽपि तत्र साक्ष्यं स्यात् षट्सु चान्वाहितादिषु ॥ 96 ॥
    यदि मृत्युशय्या पर पड़े रोगी ने अपने पुत्र व पत्नी आदि की अनुपस्थिति में
    भी धन के लेन-देन के सम्बद्ध में कुछ कह दिया है, तो उसे धर्म-सम्मत मानना
    चाहिए; क्योंकि मरणासन्न व्यक्ति के मुख से कभी मिथ्या वचन नहीं निकलता।
    सम्बद्ध व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त उसका वक्तव्य अन्तिम प्रमाण होता है। इस
    तथ्य का छह स्थानों पर परीक्षण किया जाता है।
    अभिप्राय यह है कि साक्षियों से छह ढंग से घुमा-फिरा कर, प्रश्नों की झड़ी
    लगाकर पूछना चाहिए और इस तथ्य को सुनिश्चित करना चाहिए कि साक्षी मृत
    व्यक्ति के कथन को यथावत् उद्धृत कर रहे हैं, अपनी ओर से कुछ मिलावट नहीं
    कर रहे हैं।
    नारदस्मृति / 89