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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 304 में से

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पृष्ठ 252
  1. द्यूत-समाह्वय प्रकरण
    अक्षबध्रशलाकाद्यैर्देवनं जिह्मकारितम्।
    पणक्रीडा वयोभिश्च पदं द्यूतसमाह्वयम्॥ 1 ॥
    पण लगाकर और छल-कपट का प्रयोग करते हुए अक्षों-लकड़ी से बनी
    गोटियों (पासों) से वध्रों-चमड़ी से बनी पट्टियों से अथवा शलाकाओं-हाथी
    दांत आदि से बनी कौड़ियों से खेलना अथवा दांव लगाकर पक्षियों-कबूतर, तोता,
    मैना, बटेर आदि को भिड़ाना और पशुओं-बैल, भैंसा, ऊंट तथा अश्व आदि
    को-दौड़ाना अथवा लड़ाना भिड़ाना आदि द्यूत-समाह्वय कहलाता है।
    सभिकः कारयेद् द्यूतं देयं दद्याच्च तत हृतम्।
    दशकं च शतं वृद्धिस्तस्य स्याद् द्यूतकारिणः॥ 2 ॥
    द्यूत-क्रीड़ा का संयोजक और नियन्त्रक सभिक कहलाता है, जो राजा द्वारा
    नियुक्त होता है और इस नियुक्ति के बदले वह राजा को निर्धारित कर का भुगतान
    करता है। द्यूतशाला में पराजित खिलाड़ी से धन लेकर और विजेता को देना सभिक
    का कर्त्तव्य होता है और इस सारी व्यवस्था के लिए वह विजेता से विजित राशि का
    दस प्रतिशत वसूल करता है।
    द्विरभ्यस्ताः पतन्त्यक्षा गृहे यद्यक्षदेविनः।
    जयं तस्यापरस्याहुः कितवस्य पराजयम्॥ 3 ॥
    अक्षों पासों से जुआ खेलने वाले के अक्ष के दो बार घोषित अथवा कल्पित
    अथवा निर्धारित अंक के अनुरूप सही पड़ने पर, अक्ष फेंकने वाला विजेता और
    अक्ष फेंकने की अनुमति सहमति देने वाला पराजित माना जाता है।
    कितवेष्वेव तिष्ठेरन् कितवाः संशयं प्रति।
    त एव तस्य द्रष्टारस्त एव स्युस्तु साक्षिणः॥ 4 ॥
    फेंके गये अक्ष के कल्पित अंक के अनुरूप पड़ने न पड़ने के सम्बन्ध में
    उत्पन्न सन्देह अथवा विवाद के निराकरण के लिए दर्शकों के प्रत्यक्षदर्शी होने के
    कारण उनके वचन को प्रमाण मानना चाहिए।
    अशुद्धः कितवो नान्यदाश्रयेद् द्यूतमण्डलम्।
    प्रतिहन्यान्न सभिकं दापयेत्तम् स्वमिष्टतः॥ 5 ॥
    250 / नारदस्मृति