नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
पृष्ठ 25, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 25
- द्यूत—धन दांव पर लगाकर जुआ खेलना।
- प्रकीर्णक—उपर्युक्त समूह में न आने वाले सभी अन्य विषय—झगड़े
पर लिया गया मकान ख़ाली न करना, बन्धक रखी धरती आदि को न लौटाना,
दूसरे की सम्पत्ति पर अनधिकृत क़ब्ज़ा करना, किसी की पत्नी को छीन लेना तथा
किसी का अपहरण करना आदि।
अठारह प्रकार के इन विवादों के अनेक भेद-प्रभेद हैं। आचार्यों ने इनकी
संख्या एक सौ बत्तीस मानी है। वैसे मनुष्यों के साक्ष्य तथा प्रमाण आदि क्रिया के
भेद-व्यवहार (मुकदमे) की सैकड़ों शाखाएं हो जाती हैं।
ऋणादानं पञ्चविंशति षडौपनिधिके स्मृताः।
सम्भूयोत्थे त्रयो भेदाश्चतुर्दत्ताप्रदानके ॥ 21 ॥
नवभेदा अशुश्रूषा वेतनं स्याच्चतुर्विधम् ।
अस्वामिविक्रये तु द्वौ विक्रियादानमेकधा ॥ 22 ॥
क्रीत्वा मुक्तं चतुर्भेदं समयाकार्यमेकधा।
क्षेत्रवादो द्वादशधा स्त्रीपुंसोर्भेदविंशतिः ॥ 23 ॥
दायभागे तु एकोना भेदा द्वादश साहसे ।
वाग्दण्डपारुष्योस्तु द्वयोर्भेदास्त्रयः स्मृताः ॥ 24 ॥
द्यूताह्वयं चैकभेदं षड्भेदं तु प्रकीर्णकम्।
एवमेषां प्रभेदानां द्वात्रिंशच्छतमेव वै॥ 25 ॥
विवाद के बहुमुखी होने के तथ्य की पुष्टि करते हुए स्मृतिकार नारद लिखते
हैं—उदाहरणार्थ, ऋण के लेन-देन के पच्चीस, धरोहर में गड़बड़ी करने-न करने
के सात, संयुक्त श्रम के फल-विभाजन सम्बन्धी विवाद के तीन, किसी वस्तु को
देकर वापस मांगने के चार, सेवा करने के नौ, सेवा लेकर पारिश्रमिक न देने के
चार, स्वामी न होने पर सम्पत्ति का विक्रय करने के बारह, विक्रय करके क़ब्ज़ा न
देने का एक, ख़रीदकर दाम न चुकाने अथवा मुकर जाने के चार, पाखण्ड-खण्डन
का एक, क्षेत्र सम्बन्धी विवाद के बत्तीस, स्त्री-पुरुष के आपसी सम्बन्ध के बीस,
दाय-भाग के उन्नीस, साहस के बारह, वाक्पारुष्य के तीन, दण्डपारुष्य के तीन,
द्यूत का एक और प्रकीर्णक के छह भेद हैं।
इन सभी भेदों के अतिरिक्त न जाने कितने अन्य अज्ञात भेद नित्य-प्रति जन्म
लेते और प्रकाश में आते रहते हैं।
कामात् क्रोधाच्च लोभाच्च त्रिभ्यो यस्मात् प्रवर्त्तते।
त्रियोनिः कीर्त्त्यते तेन त्रयमेतद् विवादकृत् ॥ 26 ॥
सभी प्रकार के विवादों के मूल अथवा उत्पत्ति-स्थल तीन हैं—काम, क्रोध
और लोभ। इन तीनों के कारण ही किसी विवाद का जन्म होता है। इसलिए विवाद
को त्रियोनि कहा जाता है।
नारदस्मृति / 23