नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिक्षीणे पतिकुले निर्मनुष्ये निराश्रये।
तत्सपिण्डेषु वाऽसत्सु पितृपक्षः प्रभुः स्त्रियाः ॥ २९॥
ससुराल पक्ष के आत्मीय बन्धु-बान्धवों और सपिण्डियों-पति के पिता,
सहोदर भाई, चाचा, चाचा के पुत्र, पति के पिता के दादा अथवा परदादा के भाई
अथवा उन भाइयों के पुत्र-पौत्र (सपिण्डी) -के न रहने से, विधवा स्त्री के सर्वथा
आश्रयहीन हो जाने पर उसका मायका ही आश्रयस्थल होता है। अभिप्राय यह है
कि पतिगृह में अभाव की स्थिति में ही पितृगृह की ओर देखना चाहिए।
टिप्पणी-'स्मृतिचन्द्रिकाकार' के अनुसार पुत्रहीना विधवा स्त्री को ससुराल
और मायके में आश्रय उपलब्ध न होने पर राजा (प्रशासन) को उसकी (ऐसी
स्त्रियों की) रक्षा का दायित्व संभालना चाहिए। उसे दर-दर की ठोकरें खाने
अथवा अवैध कार्यों में लिप्त होने की खुली छूट नहीं दे देनी चाहिए। राजा को
पथभ्रष्ट होने वाली स्त्रियों पर नियन्त्रण भी रखना चाहिए-
पक्षद्वयावसाने तु राजा भर्त्ता स्मृतः स्त्रियः।
स तस्याः भरणं कुर्यान्निगृह्णीयात्पथश्च्युताम्॥
स्वातन्त्र्याद्धि प्रणश्यन्ति कुले जाता अपि स्त्रियः।
अस्वातन्त्र्यमतस्तासां प्रजापतिरकल्पयत् ॥ ३० ॥
उच्च कुल में उत्पन्न और सुशिक्षित स्त्रियां भी स्वतन्त्र कर दिये जाने पर
उच्छृंखल और पथभ्रष्ट हो जाती हैं। यही कारण है कि प्रजापति ब्रह्मा ने स्त्रियों को
स्वतन्त्रता न देने का विधान किया है।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्रास्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३१ ॥
स्त्री को बचपन में पिता के, युवती होने पर पति के और वृद्धा होने पर पुत्र
के नियन्त्रण में रहना चाहिए। उसे किसी भी आयु में और किसी भी स्थिति में
स्वतन्त्र रहने का कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि स्वतन्त्रता स्त्री को पतन के गर्त की
ओर ले जाती है।
यच्छिष्टं पितृदायेभ्यो दत्त्वर्णं पैतृकं च यत्।
भ्रातृभिस्तद्विभक्तव्यमनृणी न स्याद्यथा पिता ॥ ३२ ॥
भाइयों को पैतृक सम्पत्ति का आपस में विभाजन करने से पूर्व पिता द्वारा
किसी से लिए ऋण का भुगतान करके पिता को उऋण बनाना चाहिए।
येषां तु न कृतः पित्रा संस्कारविधयः क्रमात्।
कर्तव्या भ्रातृभिस्तेषां पैतृकादेव ते धनात् ॥ ३३ ॥
पैतृक सम्पत्ति के विभाजन से पूर्व असंस्कृत भाइयों के-यज्ञोपवीत संस्कार
के उपरान्त-विद्याध्ययन आदि पर होने वाले धन के व्यय आदि की व्यवस्था
नारदस्मृति / 231