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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 304 में से

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पृष्ठ 231

सन्तान के उत्पन्न करने में असमर्थ पति द्वारा अनियुक्त (अनुमति प्राप्त किये
बिना) किसी एक अथवा अनेक पुरुषों के वीर्य को धारण करने वाली स्त्री से
उत्पन्न पुत्रों को माता के पति की सम्पत्ति पाने का कोई अधिकार नहीं। वस्तुतः वे
अपने पिता के पुत्र न होकर, अपनी मां को गर्भवती बनाने वालों के ही पुत्र होते हैं।
दद्युस्ते बीजिनो पिण्डं माता चेच्छुल्कतोहृता।
अशुल्कोपगतायां तु पिण्डदा वोढुरेव ते॥ 20॥
शुल्क लेकर गर्भवती बनी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, स्त्री के पति के पुत्र कहलाते
हैं। बिना शुल्क लिये गर्भवती बनायी गयी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, अपने जनक के पुत्र
होते हैं, माता के पति की सम्पत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं होता।
पितृद्विट् पतितः षण्ढो यश्च स्यादौपपातिकः।
औरसा अपि नैतेंऽशं लभेरन् क्षेत्रजाः कुतः॥ 21॥
शुल्क लेकर पुत्रोत्पादन के लिए किसी पुरुष की अंकशायिनी बनने वाली
स्त्री के गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को, अपने पिता (माता के पिता) को पिण्ड देने का
और उसकी सम्पत्ति में से भाग पाने का अधिकार होता है। बिना शुल्क लिये पर-
पुरुष से जने पुत्रों का अपने जनकों को ही पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति से
अपना भाग पाने का अधिकार होता है। माता के पति से उनका किसी प्रकार का
कोई सम्बन्ध नहीं होता।
दीर्घतीव्रामयग्रस्ता जडोन्मत्तान्धपङ्गवः।
भर्तव्याः स्युः कुले चैते तत्पुत्रास्त्वंशभागिनः ॥ 22 ॥
परिवार के निम्नोक्त व असामान्य स्थिति के सदस्यों का पालन पोषण करना
चाहिए और उनकी सामान्य स्थिति के पुत्रों को सम्पत्ति में से यथोचित भाग देना
चाहिए-

  1. दीर्घकालव्यापी तथा तीव्र कष्ट देने वाले किसी रोग-राजयक्ष्मा, उदरशूल,
    कैंसर, हृदयरोग, पक्षाघात तथा गुर्दे का क्षरण आदि से आक्रान्त।
  2. जड़-अशिक्षित अथवा मन्दबुद्धि।
  3. उन्मत्त, मस्तिष्क विकार से ग्रस्त तथा
  4. विकलांग-नेत्रविहीन अथवा पंगु अथवा हाथों से काम न कर पाने
    वाले।
    द्विरामुष्यायणा दद्युर्द्वाभ्यां पिण्डोदके पृथक्।
    रिक्थादर्धं समादद्युर्बीजिक्षेत्रिकयोस्तथा ॥ 23 ॥
    दोनों-वीर्यदान करने वाले और क्षेत्र के स्वामी-के द्वारा अपनाये गये पुत्र
    को दोनों-जनक और माता के पति के-पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति को
    नारदस्मृति / 229