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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 304 में से

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पृष्ठ 228

मात्रा च स्वधनं दत्तं यस्मै स्यात् प्रीतिपूर्वकम्।
तस्याप्येष विधिर्दृष्टो मातापि हि यथा पिता॥ 7 ॥
उपर्युक्त चार प्रकार के धन के समान स्त्रीधन के रूप में प्राप्त एवं सुरक्षित
अपनी सम्पत्ति को माता अपनी प्रसन्नता से अपने किसी भी बेटे को सौंपने को
स्वतन्त्र है। दूसरे भाई माता द्वारा प्रदत्त उस धन के विभाजन की मांग भी नहीं कर
सकते; क्योंकि पिता के समान ही माता को भी अपनी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी को
चुनने का पूर्ण अधिकार है।
मध्यग्न्यध्यावहनिकं भर्तृदायस्तथैव च।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम्॥ 8 ॥
देवर्षि नारद ने निम्नोक्त छह प्रकार का स्त्रीधन अविभाज्य बताया है—

  1. विवाह-वेदी पर संकल्पपूर्वक माता-पिता द्वारा प्रदत्त।
  2. ससुराल में आने पर नव-वधू को प्राप्त धन।
  3. अपने पति से प्राप्त धन तथा
    4-6. भ्राता, माता और पिता द्वारा प्राप्त धन।
    स्त्रीधनं तदपत्यानां भर्तृगाम्यप्रजासु तु।
    ब्राह्मादिषु चतुष्ष्वाहुः पितृगामीतरेषु च॥ 9 ॥
    स्त्रीधन पर सर्वप्रथम उसकी सन्तान का अधिकार है। सन्तान के अभाव में
    चार प्रकार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव—के विवाहों में से किसी एक के
    होने पर निस्सन्तान स्त्री के स्त्रीधन पर उसके पति का अधिकार है। सन्तान के न
    होने पर तथा विवाह के भी उपर्युक्त चार प्रकारों में से किसी एक के न होने पर
    स्त्रीधन पर उसके मायके वालों का अधिकार होता है।
    कुटुम्बं विभृयाद् भ्रातुर्यो विद्यामधिगच्छतः।
    भागं विद्याधनात्तस्मात् स लभेताश्रुतोऽपि सन्॥ 10 ॥
    यदि किसी भाई ने पैतृक धन की सहायता के बिना अपनी प्रतिभा और
    योग्यता से धन अर्जित किया है और संयोग से उसका भाई अविद्वान् रह गया है, तो
    विद्वान् भाई अपने अविद्वान् भाई को अपने विद्या से अर्जित सम्पत्ति में से कुछ देने
    अथवा न देने को पूर्ण स्वतन्त्र है।
    वैद्योऽवैद्याय नाकामो दद्यादंशं स्वतो धनात्।
    पित्र्यं द्रव्यं समाश्रित्य न चेत्तेन तदाहृतम्॥ 11 ॥
    इसके विपरीत यदि विद्या-प्राप्ति के लिए गये भाई के परिवार का भरण
    पोषण अथवा विद्या प्राप्ति-काल में अपने भाई के भरण पोषण का दायित्व निभाने
    वाले भाई के अविद्वान् रह जाने पर भी विद्वान् भाई द्वारा विद्या से अर्जित धन में
    भाग पाने का उसे अधिकार है।
    226 / नारदस्मृति