नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
पृष्ठ 225, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 225
- दाय-भाग
विभागोऽर्थस्य पित्र्यस्य पुत्रैर्यत्र प्रकल्प्यते।
दायभाग इति प्रोक्तं तद्विवादपदं बुधैः॥ 1॥
पुत्रों द्वारा पैतृक-सम्पत्ति का विभाजन 'दाय-भाग' कहलाता है। विद्वानों ने
इसे विवादास्पद व्यवहार माना है।
टिप्पणी— याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षरा टीकाकार के अनुसार— धन के
मूल स्वामी के साथ रक्त सम्बन्ध के कारण स्वामी के धन पर सम्बन्धी के अधिकार
के हो जाने का नाम 'दाय' है। इसके दो रूप-भेद हैं—अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध।
दादा का पोते को तथा पिता का पुत्र को मिलने वाला धन अप्रतिबन्ध दाय है। इसके
विपरीत चाचा तथा भाई आदि के पुत्र के रूप में, भावी स्वामी के न होने पर, दूसरों
को मिलने वाला धन सप्रतिबन्ध है। विभाग का अर्थ है— अनेक स्वामियों का एक
साथ बैठकर निर्धारित नियमों के आधार पर पैतृक धन की व्यवस्था का निर्णय लेना—
"तत्र दायशब्देन यद्धनं स्वामिसम्बन्धादेव निमित्तादन्यस्य स्वं भवति
तदुच्यते। स च द्विविधः अप्रतिबन्धः सप्रतिबन्धश्च। तत्र पुत्राणां पौत्राणां च
पुत्रत्वेन पौत्रत्वेन च पितृधनं पितामहधनं च स्वं भवतीत्यप्रतिबन्धो दायः।
पितृव्यभ्रातादीनां च पुत्राभावे स्वाम्यभावे च स्वं भवतीति सप्रतिबन्धो दायः।
विभागो नाम द्रव्यसमुदाय विषयाणामनेकस्वाम्यानां तदेकदेशेषु व्यवस्थापनम्।"
यह विभाजन कब व कैसे करना चाहिए—यह विवाद का विषय है। सामान्यतः
मूल स्वामी के मर जाने पर, संन्यास ग्रहण कर लेने पर अथवा स्वामित्व का
परित्याग किये जाने पर विभाजन का प्रश्न उत्पन्न होता है। इसी आधार पर दाय
शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—स्वामी के उपरत होने पर, उसके
द्रव्य का दूसरे के अधिकार में चले जाने का नाम दाय है—"स्वाम्युपरमे यत्र द्रव्ये
स्वत्वं तत्र निरूढो दाय शब्दः।"
पितर्यूर्ध्वं गते पुत्रा विभजेरन्धनं क्रमात्।
मातुर्दुहितरोऽभावे दुहितॄणां तदन्वयः ॥ 2 ॥
पिता के परलोक सिधारने पर पुत्रों को क्रमानुसार बांटकर लेना चाहिए।
नारदस्मृति / 223