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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 304 में से

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पृष्ठ 22

Petition Writer ) से विधिमान्य शर्तों पर लेन-देन की राशि और शर्तों को सरकारी
कागज़ पर लिपिबद्ध कराना।
हमारे विचार में असहाय भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत परिभाषाएं पूर्णतः व्यावहारिक
एवं तर्कसंगत होने से अधिक मान्य होनी चाहिए।
सामाद्युपायसाध्यत्वाच्चतुः साधन उच्यते।
चतुर्णामाश्रमाणां च रक्षणात् स चतुर्हितः ॥ 12 ॥
व्यवहार को चतुःसाधन और चतुर्हित बताते हुए इन दोनों की व्याख्या इस
प्रकार की गयी है-व्यवहार, उपाय कहे जाने वाले चार साधनों से साध्य होने के
कारण चतुःसाधन कहलाता है। वे चार उपाय अथवा साधन हैं-साम, दान, भेद
और दण्ड। इसी प्रकार चारों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों और चारों-
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमों के लोगों के हितों का रक्षक होने
से यह चतुर्हित कहलाता है।
टिप्पणी-अपने कार्य की सिद्धि में कुशलता का नाम उपाय है और
राजनीति में इनकी संख्या चार बतायी गयी है-
साम-प्रिय-मधुर-वाणी से प्रबोधन ।
दान-धन-धरती देना अथवा अपराध क्षमा करना अथवा पुरस्कृत करना,
अर्थात् कृपापात्र बनना।
भेद-उपकारी को उसके मित्रों, सहायकों एवं शुभचिन्तकों से अलग-
थलग कर देना।
दण्ड-धन-सम्पत्ति छीन लेना, पिटवाना, जेल में डालना अथवा प्राणहरण
करना।
'मत्स्यपुराण' में चार के स्थान पर निम्नोक्त सात उपाय बताये गये हैं-
साम भेदस्तथा दानं दण्डं च मनुजेश्वर!
उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव!
प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु।
कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च।
व्याप्नोति पादशो यस्माच्चतुर्व्यापी ततः स्मृतः ॥ 13 ॥
व्यवहार की एक विशेषता उसका चतुर्व्यापी होना है। किसी भी मुकद्दमे का
चार पक्षों से सम्बन्ध बना-जुड़ा रहता है-कर्ता-रूप में वादी और प्रतिवादी, साक्षी
(आज की भाषा में ज्यूरी), न्यायाधिकरण, अर्थात् धर्माधिकारियों की संस्था के
सदस्य (Jury के सदस्य) तथा स्वयं राजा (न्यायाधीश) प्रत्येक व्यवहार से ये
चारों सम्बन्धित रहते हैं। इस प्रकार इन चारों को व्यापने वाला होने से व्यवहार
चतुर्व्यापी कहलाता है।
20 / नारदस्मृति