नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंन गच्छेद् गर्भिणीं निन्दामनियुक्तां च बन्धुभिः ।
अनियुक्ता तु या नारी देवराज्जनयेत् सुतम् ॥ 84 ॥
जारजातमरिक्थीयं तमाहुर्ब्रह्मवादिनः ।
तथानियुक्तो यो भार्या यवीयाञ्ज्यायसो व्रजेत् ॥ 85 ॥
देवर आदि को गर्भवती, लोकनिन्दित तथा बन्धुओं द्वारा अननुमत (अनुमति
न दी गयी) अपनी भाभी से कदापि सम्भोग नहीं करना चाहिए। गुरुजनों द्वारा
अनियुक्त देवर से पुत्रोत्पन्न करने वाली स्त्री का पुत्र 'जारज'-अवाञ्छनीय व्यक्ति
के वीर्य से उत्पन्न-कहलाता है। उसे न तो पिण्डतर्पण आदि देने का और न ही
उत्तराधिकारी के रूप में पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकार मिलता है। ऐसा पुत्र भले
ही ज्येष्ठ द्वारा छोटी भाभी के उदर से अथवा कनिष्ठ भ्राता द्वारा बड़ी भाभी के उदर
से उत्पन्न हुआ हो, दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् दोनों ग्राह्य नहीं होते। ऐसा
ब्रह्मवादियों का निश्चित मत है। नियोग से उत्पन्न पुत्र तभी ग्राह्य होता है, जब
परिवार के प्रामाणिक वृद्धजनों ने दोनों को इस मिलन की पूर्व अनुमति दे रखी
होती है, अन्यथा यह मिलन दुराचार एवं पाप ही कहलाता है और इस मिलन से
उत्पन्न सन्तान का भविष्य अन्धकारमय होता है।
यवीयसो वा यो ज्यायानुभौ तौ गुरुतल्पगौ।
नियुक्तौ गुरुभिर्गच्छेदनुशिष्ट्यात् स्त्रियं च सः ॥ 86 ॥
अग्रज तथा अनुज भ्राता द्वारा अपनी भाभी (छोटे भाई अथवा बड़े भाई की
पत्नी) के साथ सम्भोग गुरुपत्नी के साथ सम्भोग के समान जघन्य अपराध है।
सन्तान-प्राप्ति के लिए परिवार के वृद्धों द्वारा ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को नियुक्त
करना-भाभी के साथ समागम की अनुमति देना-तो मात्र एक आपातकालीन
व्यवस्था है, निस्सन्तान मृत पुरुष के पिण्डदान, तर्पण आदि के लिए उसके क्षेत्र में
उसके उत्तराधिकारी की व्यवस्था का प्रयास है। अतः इसे धार्मिक अनिवार्यता के
रूप में ही देखना चाहिए।
पूर्वोक्तेन विधानेन स्नुषां पुंसवने शुचिः ।
सकृदागर्भाधानाद्वा कृते गर्भे तथैव सा ॥ 87 ॥
अतः आप्त पुरुषों द्वारा नियुक्त ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को अपनी भाभी से
केवल एक बार अथवा गर्भधारणपर्यन्त ही सम्बन्ध रखना चाहिए। उसके उपरान्त
तो ज्येष्ठ भ्राता श्वसुर के समान और भ्रातृजाया बहू के समान होती है। इसी प्रकार
कनिष्ठ भ्राता पुत्र के समान और भाभी मां के समान होती है। दोनों-स्त्री और
पुरुष-को इसी धारणा को लेकर चलना चाहिए।
अतोऽन्यथा वर्तमानः पुमान् स्त्री वापि कामतः ।
विनेयौ सुभृशं राज्ञा विप्लवः स्यादतोऽन्यथा ॥ 88 ॥
216 / नारदस्मृति