नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंविकृष्यमाणे क्षेत्रे चेत् क्षेत्रिकः पुनराव्रजेत् ।
खिलोपचारं तत्सर्वं दत्त्वा स्वक्षेत्रमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
किसी व्यक्ति के क्षेत्र में दूसरे व्यक्ति द्वारा कृषि-कार्य- हल चलाने, बीज
बोने तथा सिंचाई करने आदि- किये जाने पर उपज पकने तैयार होने से पहले ही
आ पहुंचने वाले क्षेत्र के स्वामी को खेत बोने वाले व्यक्ति द्वारा किये गये ख़र्च का
तथा उसके श्रम के मूल्य का भुगतान करने के उपरान्त ही अपने क्षेत्र पर क़ब्ज़ा
पाने का अधिकार बनता है।
तदष्टभागापचयाद्यावत् सप्त गताः समाः।
सम्प्राप्ते त्वष्टमे वर्षे भुक्तं क्षेत्रं लभेत सः ॥ २५ ॥
दूसरे के क्षेत्र में किराये पर कृषि-कर्म- जोतना, बोना, सींचना, काटना तथा
देखभाल-बचाव आदि- करने वाला कृषि की उपज के अथवा वृक्षों के फलों के
नष्ट हो जाने पर भावी लाभ की आशा से सात वर्षों तक निरन्तर धरती का भाड़ा
चुकाता रहता है तथा क्षेत्र का स्वामी क्षेत्र को उपजाऊ बनाने व फलों को सड़ने से
बचाने के लिए कोई उद्यम नहीं करता, कोई ख़र्च नहीं करता, एक प्रकार से पूर्णतः
उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है, प्राप्त आय को मुफ़्त की कमाई मानकर सन्तुष्ट
रहता है, तो आठवें वर्ष किरायेदार ही उस क्षेत्र, उपवन आदि का स्वामी बन जाता
है।
संवत्सरेणार्धखिलं खिलं तद्भूतैरस्त्रिभिः ।
पञ्चवर्षविसन्नं तु स्यात् क्षेत्रमटवीससमम् ॥ २६ ॥
एक वर्ष तक ख़ाली पड़ा रहने वाला, अर्थात् कुछ भी न बोये जाने वाला खेत
'अर्धखिल', तीन वर्षों तक लगातार ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'खिल' तथा
लगातार पांच वर्षों तक ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'अरण्य-सदृश' कहलाता है।
क्षेत्रं त्रिपुरुषं यत् स्यात् गृहं वा स्यात् क्रमागतम् ।
राजप्रसादादन्यत्र न तद्भोगः परं नयेत् ॥ २७ ॥
तीन वर्षों तक किसी खेत अथवा मकान का क़ब्ज़ा रखने वाले (बिना
किराया चुकाये अथवा किसी प्रकार का इकरारनामा किये) व्यक्ति का उस पर
स्वामित्व मान लिया जाता है। हां, यदि इस अवधि में वह सम्पत्ति सरकार द्वारा
अधिगृहीत हो जाती है अथवा स्वामित्व के विवाद के सम्बन्ध में कोई अधिसूचना
जारी की जाती है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अन्यथा स्वामित्व स्वतः सिद्ध माना
जाता है।
उत्क्रम्य तु वृतिं यत्र सस्यघातो गवादिभिः ।
पालः शास्यो भवेत्तत्र न चेच्छक्त्या निवारयेत् ॥ २८ ॥
क्षेत्र की रक्षा के लिए नियुक्त व्यक्ति द्वारा शक्ति और साधन होने पर भी कृषि
नारदस्मृति / 191