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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 304 में से

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पृष्ठ 174

अजाविके तथारुद्धे वृकैः पाले त्वनायति।
यां प्रसह्म वृको हन्यात् पाले तत् किल्विषं भवेत् ॥ 15 ॥
व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं द्वारा घेरकर मारी गयी तथा किसी व्याध आदि
द्वारा बाँधी गयी भेड़-बकरी के मर जाने पर पशुपालक को ही उत्तरदायी ठहराया
जाता है; क्योंकि उसकी उपेक्षा से ही भेड़ बकरी झुण्ड से अलग हो गयी और
शिकारी का शिकार बन गयी। इसके लिए उसे मृत पशु का न केवल मूल्य चुकाना
होता है, अपितु कोताही के लिए दण्ड भी भुगतना होता है।
विधुस्यापहृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति।
यदि देशे च काले च स्वामिनश्चापि शंसति ॥ 16 ॥
चोरों द्वारा बलपूर्वक पशुओं का अपहरण किये जाने की सम्बद्ध स्वामियों
और अधिकारियों को यथाशीघ्र सूचना देने वाला गोपालक पशुओं की हानि के
लिए उत्तरदायी नहीं होता।
अनेन सर्वपालानां विवादः समुदाहृतः।
मृतेषु च विशुद्धिः स्याद्बालशृङ्गादिदर्शनात् ॥ 17 ॥
इसी प्रकार किसी पशु की अपनी ही चञ्चलता से मृत्यु हो जाने पर मृत पशु
के बाल, सींग आदि लाकर दिखाने वाले गोपालक से क्षतिपूर्ति की मांग नहीं की
जा सकती।
पशुपालों के सम्भावित विवादों का विवरण इतना ही है।
शुल्कं गृहीत्वा पण्यस्त्री नेच्छन्ती द्विस्तदाप्नुयात्।
अप्रयच्छंस्तदा शुल्कमनुभूय पुमान् स्त्रियम् ॥ 18 ॥
किसी पुरुष से सम्भोग शुल्क लेकर उसे अंग-सुख देने से इनकार करने
वाली वेश्या को वसूल किये गये शुल्क का दुगुना लौटाना होता है। इसी प्रकार
वेश्या को सम्भोग के उपरान्त शुल्क देने का वचन आश्वासन देकर, फुसलाकर
सम्भोग करने और फिर शुल्क न चुकाने वाले पुरुष से भी दुगुना शुल्क वसूल
करना चाहिए।
अयोनौ वा समाक्रामेद्बहुभिर्वापि वासयेत्।
शुल्कं सोऽष्टगुणं दाप्यो विनयं तावदेव तु ॥ 19 ॥
किसी वेश्या को भोग के लिए अनुबन्धित करके उसकी योनि के अतिरिक्त
अन्यान्य अंगों-मुख, गुदा आदि-में लिंग प्रवेश करने वाले तथा अपने लिए
अनुबन्धित वेश्या को अपने माथियों से भी भोग कराने को विवश करने वाले से
निश्चित शुल्क का आठ गुना वसूल करना चाहिए।
पराजिरे गृहं कृत्वा स्तोमं दत्त्वा वसेत्तु यः।
स तद्गृहीत्वा निर्गच्छेत्तृणकाष्ठेष्टकादिकम् ॥ 20 ॥
172 / नारदस्मृति