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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 304 में से

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पृष्ठ 14

जाने वाले—धर्म, (15) दाय-भाग, (16) श्राद्ध-कर्म, (17) शौच तथा आचार
की वैकल्पिक-संकटकालीन-व्यवस्था, (18) भक्ष्य-अभक्ष्य विवेचन, (19)
विक्रेय-अविक्रेय पदार्थों की मीमांसा, (20) पातक-भेद, (21-22) स्वर्ग तथा
नरक का वर्णन, (23) प्रायश्चित्त-विधान तथा (24) उपनिषदों का रहस्य स्थान।
नारदजी के अनुसार इतना विशाल ग्रन्थ जब उनके हाथ में आया, तो उन्होंने
इसका अध्ययन करने के उपरान्त सोचा कि इतने बड़े ग्रन्थ को संभाल पाना तो
मनुष्यों की शक्ति-सीमा के बाहर है। इसके अतिरिक्त इसे समझ पाना भी सरल
नहीं। यह सब सोचकर महात्मा नारद ने लोगों की सुख-सुविधा की दृष्टि से सम्पूर्ण
ज्ञान का बारह हज़ार श्लोकों में समाहार करके महर्षि मार्कण्डेय¹ को सौंप दिया।
महर्षि मार्कण्डेय ने भी कलियुग के जीवों की आयु और शक्ति की सीमा को
ध्यान में रखते हुए बारह हज़ार श्लोकों का आठ हज़ार श्लोकों में समाहार करके
महर्षि भार्गव को प्रदान किया। विवेकशील महर्षि भार्गव ने आठ हज़ार श्लोकों
वाले स्मृति-ग्रन्थ का अध्ययन किया और उन्हें लगा कि छोटी आयु और रोग-
शोक से ग्रस्त तथा शक्तिहीन लोगों के लिए आठ हज़ार श्लोकों वाले ग्रन्थ को
संभाल पाना भी सम्भव नहीं। अतः उन्होंने लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित
होकर आठ हज़ार श्लोकों का चार हज़ार श्लोकों में समाहार कर दिया। इस प्रकार
देवों और गन्धर्वों के लिए एक लाख श्लोकों में निबद्ध स्मृति-ग्रन्थ को मनुष्यों की
अल्प आयु और सीमित शक्ति के सन्दर्भ में चार हज़ार श्लोकों में समेट दिया गया।
चार हज़ार श्लोकों में समाहरित स्मृति-ग्रन्थ का प्रथम पद्य है—
आसीदिदं तमो' भूतं न प्राज्ञायत किंचन।
ततः स्वयंभूर्भगवान् प्रादुरासोच्चतुर्मुखः ॥
प्रलयकाल में चारों ओर घना अन्धकार घिरा हुआ था। न कहीं प्रकाश का
कोई चिह्न था और न ही कहीं कोई इस सम्बन्ध में कुछ जानने वाला था। इस
स्थिति का अन्त करने के लिए सर्वसमर्थ चतुरानन भगवान् ब्रह्मा का आविर्भाव
हुआ।
ब्रह्माजी के आदेश-निर्देशानुसार-चार हज़ार श्लोकों वाले स्मृति-ग्रन्थ में
निरूपित विषय को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप देने के लिए 'प्रकरण' बनाये गये।
इन्हीं प्रकरणों में प्रथम प्रकरण में व्यवहार-विषय के निरूपण को स्थान दिया गया
और देवर्षि नारद ने प्रस्तुत ग्रन्थ-'व्यवहारमातृका' - की रचना की। इसके प्रथम
अध्याय के चौहत्तर (74) पद्य हैं।

  1. महाभारत के अनुशासन पर्व के एक उल्लेख से यह संकेत मिलता है कि देवर्षि नारद का
    ग्रन्थ महर्षि मार्कण्डेय के लिए उपजीव्य ग्रन्थ रहा है।
    "धर्मसंकटे पतितो मार्कण्डेयो नारदं पृष्ट्वाधर्मं निश्चिनोति।" अर्थात् मार्कण्डेय जब कभी
    धर्म के निर्णय में संकटग्रस्त हो जाते हैं, तो समाधान के लिए 'नारदस्मृति' की शरण लेते हैं।
    12 / नारदस्मृति