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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 176 में से

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पृष्ठ 93

हिन्दीटीकासहित ९१
फल देकर उसकी सिद्धि प्रदान कर देते हैं॥१४॥
तथा हि वाक् शची दुर्गा धाता शक्रस्त्रियम्बकः ।
इति नानाभिधारूपो लक्ष्मीशः स्वयमिज्यते ॥१५॥
जैसे विविध धर्मादि अनुष्ठानों में वाणी (सरस्वती), इन्द्राणी, दुर्गा, ब्रह्मा, इन्द्र
तथा रुद्र आदि के रूप में जहाँ उपासना की जाती है वहां भी अनन्य भाव से यही मानना
चाहिए कि स्वयं लक्ष्मीश श्रीनारायण ही अपने इन विराट्रूपों में यहाँ यज्ञादि से
उपासित (हो रहे) हैं।१॥१५॥
तथैवात्मपृथिव्याद्या यतो लक्ष्मीपतेर्वपुः ।
अतस्तैरौपनिषदैरिज्यतेऽखिलविग्रहः ॥१६॥
और जैसे श्रीहरि के सभी जीव तथा पृथ्‍वी आदि सभी अंश स्वरूप माने गये हैं ।
अतः उपनिषद् के विद्वानों (वेदान्तशास्त्रवेत्ताजन) के द्वारा ब्रह्म को सभी के
उपादानभूत शरीर के रूप में माने जाने के कारण अन्तर्यामी तथा विराट्रूप में
लक्ष्मीपति के शरीर का अर्चन किया जाता है। (इस प्रकार परमैकान्तिक रूप में
श्रीहरि एकमात्र शरण्य तथा उपास्य बन जाने के कारण अन्तर्यामी रूप हैं, अतः
एकनिष्ठता सुरक्षित रहती है)॥१६॥
ततः शुद्धं परं ब्रह्म विशुद्धपरिवारकम् ।
इज्यते विविधैर्भोगैर्नित्यञ्च प्रतिमादिषु ॥१७॥
इसलिए शुद्धरूप वाला परब्रह्म ही दिव्य विग्रह में स्थित तथा विशुद्ध देवीभूषण
दिव्यायुधगण आदि परिवार से युक्त प्रतिमादि में विविध समर्पणीय भोगों से नित्य
ही अर्चित होता है (जो मिश्र रूप में अन्तर्यामी तो है पर प्रतिमादि में नित्य एवं
शुद्ध यजनीय भी है)॥१७॥
अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या जीवा विष्णोर्विभूतयः ।
तान् वै कुदृष्टयः साम्यात् परत्वाद्वाप्युपासते ॥१८॥
जो ब्रह्मा तथा रुद्ररूप अशुद्ध कर्मभाव से रहने से जीवभूत होकर देवभाव से अर्चित
भी हो तो भी वे श्रीविष्णु की विभूति के रूप में मान्य हैं। उनको समता का स्थान
देकर या परमदेवता के रूप की भावना तथा बुद्धि से जो उपासना करते हैं वे
१ आशय यही है कि अनेक नाम तथा रूप से विशिष्ट श्रीलक्ष्मीपति ही सर्वत्र उपासित हैं क्योंकि ये
ही प्रत्येक देव में भी अन्तर्यामी रूप से अवस्थित हैं। यहाँ लक्ष्मीश पद सार्थक एवं साभिप्राय रूप से
रखा गया है। कहा भी है कि- देवतिर्यङ्मनुष्येषु पुन्नामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी लक्ष्मीर्मैत्रेय
नानयोर्विद्यते परम्।।' अतएव देवीभूत शक्ति का आराधन श्रीलक्ष्मीजी का तथा ब्रह्मादि देवाराधन
श्रीहरि का आराधन है।