नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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किया जावे।)॥४३॥
तमसो भस्म रजसो गन्धः सत्वस्य मृत्तिका ।
तस्माद् भस्मादिभिर्नेच्छेदेकान्ती शुद्धिमात्मनः ॥४४॥
भस्म आदि पदार्थ तामसिक, गन्धयुक्त पदार्थ राजस तथा मृत्तिका सात्विक कारण
वाली होती है, अतः नैष्ठिक वैष्णव (एकान्ती) आत्मशुद्धि के कारणभूत तिलक को
स्वयं करने में भस्मादि पदार्थों की इच्छा न करे या उनका उपयोग न करे (किन्तु
सात्विक मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र स्वयं सम्पादित करे)॥४४॥
रौद्रव्रतादिनियतैस्तथा मोहनतान्त्रिकैः ।
शवेन्धनकरीषादिभस्मभिः कर्म साध्यते ॥४५॥
क्योंकि रुद्रादि के उपासनादि व्रतों में उपयोग की जाने वाली तथा मोहनादि कर्मों
में तान्त्रिकादिजन के उपयोग में रहनेवाली भस्म जो कि शव, ईन्धन तथा करीषादि
(सूखे गोवरों) से प्राप्त होती है तथा जिससे तन्त्रादि कर्मों की साधना की जाती है।
अतः ऐसी निषिद्ध भस्म से कभी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं किया जावे॥४५॥
मूलजं गन्धसारादि मृगनाभ्यादि जीवजम् ।
मनःशिलादि धातूत्थं त्रयं पुण्ड्रेषु कामिनाम् ॥४६॥
किसी वृक्ष की जड़ से प्राप्त सुगन्धित द्रव्य, किसी प्राणी के शरीर से प्राप्त होने वाले
कस्तूरी आदि द्रव्य तथा धातु या पत्थर से निकलने वाले मनःशिला (मैनसिल)
जैसे सुगन्धित द्रव्य इन तीनों से पुण्ड्र किसी पदार्थादि के कामीजन तिलकरूप में
लगाते हैं। (अतः इनसे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं करना चाहिए)॥४६॥
कुर्याद् रक्षाविधानञ्च नान्यैः पञ्च विना मृदः ।
गोरजो गोकरीषञ्च चूर्णं हारिद्रमेव च ॥४७॥
विहित तथा ग्राह्य पांच मृदा (मिट्टियों) को छोड़कर तथा गोरज, गोबर की राख,
हरिद्रा के चूर्ण तथा पांच प्रकार की मृत्तिका को छोड़कर अन्य भस्मादि से
रक्षाविधान कर्म नहीं करना चाहिए॥४७॥
न च भागवतः कुर्यादूर्ध्वपुण्ड्रममृत्तिकम् ।
धारणादेव मृत्स्नायाः प्रीयते धरणीधरः ॥४८॥
बिना विहित सात्विक मृत्तिका के अन्य किसी वस्तु से भागवत वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र न
करे क्योंकि मृत्तिका के तिलक मात्र के धारण से धरणीधर श्रीविष्णु तुष्ट हो जाते
हैं॥४८॥
यः प्रपन्नोऽपि लक्ष्मीशं न चक्रादिभिरङ्कितः ।
न वहत्यूर्ध्वपुण्ड्रं वा नैकान्त्यन्तस्य विद्यते ॥४९॥
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