नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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(जैमिनि आदि के वस्तु परीक्षणादिरूप मीमांसा) शास्त्रों से वेदों के अर्थों का
विचार कर तथा वहाँ श्रीविष्णु की आराधनारूप कर्मों को ध्यान देकर
समझें॥३६॥
व्यवस्थां पदवर्णादिश्चन्दः कालक्रियाविधिम् ।
ज्ञात्वाऽङ्गैर्गमयेदर्थान् न्यायैः सर्वत्र साधुभिः ॥३७॥
वेद मन्त्रों की पद वर्णादि की व्यवस्था, प्रमाणादि व्यवस्था, छन्दों की गायत्री आदि
में व्यवस्था, काल स्वरूप तथा स्थिति, यज्ञादि की क्रिया विधि आदि को अङ्गों के
द्वारा (अर्थात् पद व्यवस्था को व्याकरण शास्त्र से वर्णव्यवस्था को शिक्षा के द्वारा)
प्रमाणादि व्यवस्था को मीमांसादि शास्त्रों के न्यायों के द्वारा, छन्द की व्यवस्था,
छन्दोविचितिसे, काल की ज्योतिषशास्त्र से क्रियाविधि को कल्पसूत्र से जानकर
सम्यक्रूप से अर्थों का विचार सम्पन्न करें॥३७॥
शिष्टैर्वर्णाश्रमादीनामच्युताराधनात्मकान् ।
स्मृतांश्च विविधान् धर्मान् विद्याद्वैदिकसम्मतान् ॥३८॥
मनु आदि शिष्ट धर्मशास्त्र वेत्ताओं के द्वारा मान्य वर्ण आश्रम आदि धर्मों को तथा अच्युत
की आराधना के लिये स्मृत्युपदिष्ट (पुराणाद्युपदिष्ट वैदिक धर्म के समस्त विविध धर्मों
का ज्ञान प्राप्त करे।) मनु आदि के धर्मशास्त्रों से कर्मभाग का उपबृंहणं सम्पन्न करें या
उनका ज्ञानार्जन करें॥३८॥
अथौपनिषदञ्चार्थं शृणुयान्न्यायतः सुधीः ।
येनाराध्यं परं ब्रह्म जानीयात् पुरुषोत्तमम् ॥३९॥
इस प्रकार कर्म-विचार के बाद 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि ब्रह्म-विद्या उपनिषदों के
गूढ़ अर्थों का न्यायादि के साथ परिशीलन करें (स्वाध्याय करे) और इस प्रकार वह
सुधी 'पुरुषोत्तमं परं ब्रह्म' का जो कि आराध्य है, ज्ञान प्राप्त करे॥३९॥
पञ्चरात्रं महद्दिव्यं शास्त्रं श्रुतिविभावनम् ।
विशेषेणाधिगन्तव्यं गीतं भगवता स्वयम् ॥४०॥
वह उपनिषदों के इन अर्थों का पंचरात्र, इतिहास तथा पुराणादि के साथ वेदान्त
परिव्रह्मण के सम्पन्न करने के क्रम में तब भगवान् के द्वारा स्वयं उपदिष्ट महत् 'पञ्चरात्र
शास्त्र' का जो दिव्य तथा वेदों के गुह्यार्थ को दिखलाने वाला है, उसे विशेषरूप में जाने
(इसे महत् कहने का आशय यह है कि इस आगम में एक सौ आठ संहिताएँ आती हैं) अतः
यह विशालरूप वाला है॥४०॥
१ इसका कारण यह है कि वेद तथा वेदान्त के अनुमत तत्वों को विस्तीर्ण मीमांसा के कारण अंतरंग भूत
शास्त्र होने के कारण इनका अनुशीलन विशेषरूप में करना आवश्यक है।