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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 176 में से

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पृष्ठ 45

हिन्दीटीकासहित ४३
विहितान्तर्गतान्येव दृष्ट्यादीनि तथापि तु ।
तेषां विशेषमान्यत्वात् पृथक् चाङ्गतया विधिः ॥८२॥
वृत्ति आदि से होने वाले ज्ञान या ‘दृष्टि’ आदि यद्यपि विहितकर्मों के अन्तर्गत ही है
फिर भी इनकी विशेषरूप में मान्यता रहने के कारण इनकी अंगरूप विधि
पार्थक्य रूप में स्थित मानी गई है॥८२॥
निषिद्धान्तर्गतान्येव विरुद्धान्यखिलान्यपि ।
हानं सर्वस्य चैकाङ्गं पृथग्व्याचक्षते परे ॥८३॥
इस प्रकार दृष्टि, लक्ष्म या चिह्नधारणादि तथा सत्सेवा जैसे कर्मों के आचरण के
विपरीत रहनेवाले सभी कार्य विरुद्ध होने के कारण निषिद्ध कर्मों के अन्तर्गत आ
जाते हैं। अतः ये सभी वर्ज्य है तथा इनकी प्रत्येक अंगके रूप में पृथक् से आगे व्याख्या
की गयी है¹॥८३॥
आनुकूल्यस्य सङ्कल्पात् प्रातिकूल्यस्य वर्जनात् ।
प्राप्ते समस्तेऽपि तथा विश्वासादेः पृथग्विधिः ॥८४॥
इस प्रकार अनुकूल संकल्प को लेने के तथा प्रतिकूल आचारादि के निषेध के कारण
समस्त विश्वासादि के सिद्ध हो जाने पर भी जैसे इन विश्वासादि की पृथक्रूप
में विधि होती है, इसी प्रकार यहां समझना चाहिए॥८४॥
न कर्म हीनं ज्ञानेन न तत्तेन न ते अपि ।
भक्त्या ताभ्यां न सां तानि न वैराग्येण तन्न तैः ॥८५॥
क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से रहित कर्म विहित नहीं होता है तथा यह ज्ञान भी कर्म से
हीन या उसके बिना नहीं रहता और ये कर्म तथा ज्ञान दोनों ही भक्ति के बिना
श्रीभगवान् की प्राप्ति में हेतु नहीं हो सकते हैं। ये कर्मादि भी वैराग्य के बिना नहीं
और इन भक्त्यादि से रहित या प्रतिकूल निषेधादि भी भगवन् की प्रीति में हेतु
नहीं बन सकते हैं॥८५॥
विहिताचरणं कर्म वैराग्यं निन्यवर्जनम् ।
ज्ञानं सुदृष्टिर्भक्तिस्तु हरिचिह्नसमाश्रया ॥८६॥
विहित आचार में स्थित रहना ‘कर्म’ है तथा निन्य या निषिद्ध कर्मों का परिवर्जन
ही ‘वैराग्य’ कहलाता है। सम्यक् ‘दृष्टि’ है इष्ट का ध्रुव ज्ञान तथा यही हरि के
१ इस पंक्ति का आशय है कि जैसे विहिताचार के अन्तर्गत दृष्टि आदि की पृथक् अङ्गरूप में विधि
रखी जाती है इसी तरह प्रतिषिद्ध के वर्जन के अन्तर्गत दृष्ट्यादि के विरुद्ध वर्ज्य या हानि की
पृथक् अंगके रूपमें स्थिति होगी। इस व्याख्या के कारण वृत्ति की षड्विधता के साथ एक अंग की
और वृद्धि होती है।