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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

हिन्दीटीकासहित १६७
| पृष्ठे | | पृष्ठे |
| परिपत्सु च सान्निध्यं— | १५५ | प्रभाते दिव्यलोकस्थं— | १०१ |
| परीत्य सह शिष्येण— | १११ | प्रभुं भक्तपराधीनं— | ५७ |
| परीवाराँश्च सेवेत— | ५८ | प्रशस्तं भगवद्भक्तं— | ५१ |
| पवित्राण्यब्जबीजानि— | ६३ | प्रशासितुरशेषाणां— | २७ |
| पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण— | १०८ | प्रसादनं क्षमापञ्च— | १५४ |
| पाखण्डशैवशाक्तादि— | ४५ | प्रसादनानामीशस्य— | १३० |
| पातकानि समस्तानि— | ७१ | प्राकृताद्यैः परिहृतो— | १४० |
| पातकेन कुदृष्टान्य— | ९६ | प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य— | १०९ |
| पादोदकं भगवतो— | ५८ | प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैः— | १०३ |
| पीत्वानैकान्तिनां सोमं— | १२० | प्रातरुत्थाय विधिवत्— | ४९ |
| पुण्येऽनुकूले समये— | ३७ | प्रातर्माध्यन्दिने साय— | १०० |
| पुनरेवं मुनिश्रेष्ठ— | १४५ | प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं— | १३८ |
| पुरराष्ट्राभिवृद्ध्यर्थं— | ५९ | प्राप्तुमिच्छन् परां— | २८ |
| पुराणान्यवगाहेत— | ५६ | प्राप्याभिगमनं दृष्ट्वा— | १३५ |
| पूर्वमेव यथान्यायं— | ४९ | प्रायश्चित्तं तु परम— | ५२ |
| पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा— | ११२ | प्रायेण धर्मान् व्यामिश्रान्— | १२६ |
| पूर्वेषामुत्तरेषाञ्च— | १३२ | प्रायो गुणवशादेष— | २७ |
| प्रकृतिं पुरुषं योगं— | ७२ | प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णो— | ६८ |
| प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे— | ६४ | प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्ग— | ५७ |
| प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन— | १०९ | प्रीत्यप्रीतिसमायोगं— | ८२ |
| प्रच्छादनञ्च दोषाणां— | १५५ | फलानाञ्चान्यतः प्राप्तिः— | १५८ |
| प्रजापालनरूपञ्च— | ५३ | बहुजन्मकृतैः पुण्यैः— | ३९ |
| प्रणयेन तथा व्यूहै— | ६२ | बालमूकजडान्धांश्च— | ३१ |
| प्रणामं स्पर्शनं सेवां— | ७५ | बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं— | ७३ |
| प्रणामः कीर्तनं वापि— | ३१ | बाह्याः सदसतां नास्ति— | ९२ |
| प्रणामाङ्गनमुख्येन— | ३० | बाह्या निर्देवताश्चैव— | ९३ |
| प्रतप्तैर्भगवद्दिव्या— | १५३ | वाह्यानां जिह्मदृष्टीनां— | ८० |
| प्रतिष्ठां सर्वधर्माणां— | ५४ | बाहोर्ललाटे शिरसि— | ५९ |
| प्रत्येकञ्च यथारूपं— | १११ | बुद्ध्वाऽपि परमात्मानं— | १२९,१२९ |
| प्रथमासनसंस्कारो— | १४९ | ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्राः— | २८ |
| प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये— | १२३ | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च— | ५४ |
| प्रधानमहदादीनां— | १४७ | ब्रह्मरुद्रदिगीशार्क— | ६८ |
| प्रपत्तिं कारयन्त्येव— | २८ | ब्रह्मरुद्रमुखा देवा— | १५६ |
| प्रपत्तिरानुकूल्यस्य— | २९ | ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः— | ५९ |
| प्रपत्तेर्ह्यात्मनिक्षेपो— | ४२ | ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यै— | ४९ |
| प्रपन्नमपि यं कञ्चित्— | १३१ | भक्तिज्ञानसमाचार— | १५५ |
| प्रपन्नस्यापि हि पुन— | ४४ | भक्तिप्रकाण्डविस्तारो— | १४६ |
| प्रपन्नैश्चान्यभजना— | ८१ | भक्तिस्तु विविधा भोगा.— | १४५ |
| प्रपित्सुर्मन्त्रनिरतं— | ३३ | भगवच्चरणाम्भोजा— | १४८ |