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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

हिन्दीटीकासहित १३९
एकान्तीजन की स्थिति तक उसे विकसित कर पहुँचावे जिससे वह उत्कृष्ट एकान्ती
हो जाए॥७४॥
अजिह्मा सात्त्विकी बुद्धिर्येषां शास्त्रावगाहिनी ।
तेषां नारायणे भक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ॥७५॥
जिनकी बुद्धि शास्त्र का अर्थ ग्रहण करने में समर्थ सत्वगुणवाली तथा सरलवृत्ति की
है उनकी अन्य देवताओं की आराधनाओं से टूट कर एकनिष्ट भाव से श्रीहरि में
स्थित भक्तिवाली बुद्धि हो जाती है॥७५॥
येषां शास्त्रेषु गाढापि राजसी कुटिला मतिः ।
तेषां न जायते भक्तिर्हरौ जातापि च स्खलेत् ॥७६॥
और जिनकी प्रतिशास्त्र में अर्थावगाहिनी बुद्धि राजसी गुणोंवाली हो तथा जिसमें
कुटिलवृत्ति के कारण अनेक देवताओं में अपेक्षावश निष्ठा निर्माण होती है
तो उनकी श्रीनारायण में भक्ति उत्पन्न नहीं होती और कदाचित् उत्पन्न होती भी है
तो वह स्थिर नहीं होने से बाद में स्खलित या दूर हो जाती है॥७६॥
तमसाभिप्लुता येषां शास्त्रेष्वक्रमते न धीः ।
न ते स्वात्मानमीशं वा बुद्धयन्ते देहबुद्धयः ॥७७॥
तथा जिनकी बुद्धि शास्त्रादि के अनुशीलन से नहीं चलती, ऐसे जो व्यक्ति तमोगुण
से युक्त होते हैं वे देहादिस्थूल पदार्थ तक ज्ञान के पहुँचने के कारण आत्मा के
अधिपति परमात्मा को जानने में असमर्थ रहते हैं। (तथा वे श्रीहरि के ज्ञान तथा
भक्ति की प्राप्ति से वंचित हो जाते हैं)॥७७॥
लोभाद्वा यदि वा मोहाच्छिष्यं शास्ति न यो गुरुः ।
नास्मात् संशृणुते यश्च प्रच्युतौ तावुभावपि ॥७८॥
जो आचार्य लोभ या मोह के वश में होकर अपने शिष्य को अनुशासन में नहीं रख
पाते तथा जिसके उपदेशादि शास्त्रवृत्त को शिष्य नहीं सुनते न उस पर ध्यान देते हों
तो ऐसे आचार्य तथा शिष्य दोनों का पतन हो जाता है (अतएव सात्विक गुणवाले
शिष्य को ही गुरु उपदेश देकर उसे कल्याण प्राप्ति करवा सकता है तथा ऐसे ही
शिष्य रखना उचित है)॥७८॥
अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं यः परं ज्ञानमावहेत् ।
प्रमाद्यतः सुगोप्तव्ये परमार्थोऽस्य हीयते ॥७९॥
इसीलिये शिष्यरूप क्षेत्र की बिना चिरकाल तक परीक्षा के ही जो उसमें
परमार्थसाधक परम ज्ञानरूप बीज का आधार उपदेश द्वारा सम्पन्न करता है तो
अत्यंत गोपनीय मोक्षोपायभूत ज्ञान के प्रदानरूप प्रमाद करने से उस आचार्य की भी