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सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 226 में से

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पृष्ठ 188

स्यात्। 'निषेधवाक्यालङ्कारजिज्ञासानुनये खलु' इत्यमरः। 'अलं खल्वोः प्रतिषेधयोः'
प्राचां क्त्वा'इति उभयत्रापि क्त्वाप्रत्यय इह 'न पादादौ खल्वादयः' इति निषेधस्यो-
द्धेजकत्वाभिप्रायत्वान्नञर्थस्य खलुशब्दस्यानुद्भाजकत्वान्नञ् देवपादादौ प्रयोगो न
दूष्यत इति अनुसन्धेयम् ॥ ८४ ॥
हे प्रिय ! हे विशेषज्ञ ! (अथवा हे प्रियतम को विशेष रूप से जानने वाले
हंस ! ) मेरी प्रार्थना को विफल मत बनाओ। जो करना है, उसके सम्बन्ध में
तरह-तरह के अ-यत्न आदि अड़चन न पैदा करो। आश्रवता (कही हुई प्रतिज्ञा
को पूरी करने वाले ) के उच्च पद से लड़खड़ा कर नीचे मत गिरो। जिस कार्य
से निन्दकों को मिथ्या उक्ति कहने में विनोद हो उससे दूर रहो (अर्थात् जिस
विषय में दुर्जन भी निन्दा न करें, उससे पथभ्रष्ट न होओ) तथा कीर्ति रूप
मार्ग से विचलित मत होओ ॥ ८४ ॥
स्वजीवमप्यार्तमुदे ददद्भ्यस्तव त्रपा नेदृशबद्धमुष्टेः।
मह्यं मदीयान्यदसूनदित्सोधर्मः कराद् भ्रश्यति कीर्तिधौतः ॥ ८५ ॥
स्वेति। ईदृशबद्धमुष्टेः = ईदृक्कटलुब्धस्य, तव [आर्तमुदे] आर्तानां मुदे
प्रीतयै, स्वजीवं ददद्भ्यः = स्वप्राणव्ययेन परत्राणं कुर्वद्भ्यो जीमूतवाहनादिभ्य
इत्यर्थः । 'जीवं जीमूतवाहनः' इति प्रसिद्धम् । त्रपा न इति काकुः । त्रपाया मनः-
प्रत्यावृत्तिरूपत्वात्तदपेक्षया तेषामपादानत्वात् पञ्चमी। यत् = यस्मात् मदीयाने-
वासून = प्राणान् मह्यम् अदित्सोः तव, [ कीर्तिधौतः ] कीर्त्या धौतः शुद्धः,
धर्मः करात् = हस्ताद् भ्रश्यति। न चैतत्तवार्हमिति भावः ॥ ८५ ॥
मेरे ही प्राण (प्राण-नाथ नल) को मुझे न प्रदान करने की इच्छा से,
तुम (व्यय हो जाने के भय से, मुट्ठी बाँध कर, धन सञ्चय करने वाले अर्थात्)
नितान्त कृपण बनने पीडित व्यक्तियों की प्रसन्नता के निमित्त, अपना जीवन प्रदान
करने वाले (दधीचि, शिवि, जीमूतवाहन आदि) का विचार कर भी-तुम्हें
लज्जा नहीं आ रही है? इसलिए तुम्हारे हाथ से, (धन-दान की) कीर्ति से
धवल हुआ धर्म (परोपकार करने का पुण्य) गिरा जा रहा है ॥ ८५ ॥
दत्त्वात्मजीवं त्वयि जीवदेऽपि शुष्यामि जीवाधिकदे तु केन।
विधेहि तन्मां हलहोलमग्नां मुद्रितेन्द्रिय-समुद्र-मग्नाम् ॥ ८६ ॥
दत्त्वेति । किं च, जीवदे = प्राणदे, त्वयि. विषये, आत्मजीवं = मत्प्राणं,