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सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 226 में से

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पृष्ठ 180

विहितायाः शेष इति समासनिषेधोऽपि शेष षष्ठीसमासः । तत्र स्पृहा,
इति मम मनः = द्विजराजपाणिग्रहेति चेतो नलं कामयत इति श्लोकद्वयार्थः ।
सुधिया = विदुषा मया नाश्लेषि = नामाहि किं ?, गृहीत एवेत्यर्थः ॥६६॥
श्लेष शब्द का प्रयोग करने वाली, आप जैसी कवयित्री का—'नृप के साथ
पाणिग्रहण की अभिलाषा है' ( श्लोक ५६ ), और 'मेरा चित्त नल को चाहता
है' ( श्लोक ६७ )—इन दोनों श्लोकों का अभिप्राय, मुझ बुद्धि रखने वाले की
समझ में क्या नहीं आया ? ( अर्थात् आपके तात्पर्य को मैं समझ गया ) ॥६६॥
त्वच्चेतसः स्थैर्यविपर्ययं तु सम्भाव्य भाव्यास्मि तदज्ञ एव ।
लक्ष्ये हि बाळाहृदि लोलशीले दरापराद्धेषुरपि स्मरः स्यात् ॥७०॥
तर्हि किमर्थं करेण वाञ्छेत्यादिकं अज्ञवदुक्तमित्यत आह—त्वच्चेतस इति ।
किं तु त्वच्चेतसः स्थैर्यविपर्ययम् = अस्थिरत्वं संभाव्य = आशङ्क्य, तदज्ञः =
तस्य श्लोकद्वयार्थस्य अज्ञः अनभिज्ञः, भावा = भविष्यन् । 'भविष्यति गम्यादयः'
इति साधुः । अस्मि । त्वच्चित्तनिश्चयपर्यन्तमित्यर्थः । 'धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः' इति
भविष्यत्ताया गुणत्वाद्वर्तमाना नुरोधः । नन्वेवमनुरक्तायां मयि कुत इयं शङ्केत्या-
शङ्क्य स्त्रीणां चित्तचाञ्चल्यसम्भवादित्याह— लक्ष्य इति । लोलशीले = चञ्चल-
स्वभावे, बाळाहृदि बालायाः हृदि चित्त एव लक्ष्ये, स्मरोऽपि दरापराद्धेषुः
ईषच्च्युतसायकः स्यात् । कुशलोऽपि धन्वी चललक्ष्यात् कदाचिदपराध्यत इति भावः ।
'अपराद्धपृषत्कोऽसौ लक्ष्याद्यश्च्युतसायकः' इत्यमरः । अर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः॥७०॥
तो (अर्थात् आप कहें कि यदि मेरे अभिप्राय को जान ही गये हो तो क्यों
मुझे निर्लज्ज बनाकर, उसी बात को मेरे मुँह से कहलवाना चाहते हो तो इसका
उत्तर यह है कि ) आपके चित्त की अस्थिरता की सम्भावना करके, मैं उस
( अभिलाषा ) के बारे में अनभिज्ञ बनकर, पूछ रहा हूँ, क्योंकि ( बाल्यावस्था के
कारण ) चञ्चल शील-स्वभाव वाली, मुग्धा बाला के हृदय को लक्ष्य बनाने में,
( निशाने वाली वस्तु ) हृदय के अस्थिर होने की आशङ्का से, ( अचूक निशाने-
बाज़ ) कामदेव भी कहीं अपना निशाना न चूक जाय । ( यदि लक्ष्य स्थिर है,
तब तो लक्ष्यभेद सरल है; और यदि लक्ष्य स्थिर नहीं है, हिलता-डुलता रहता है,
तब निशाना लगाने में बड़ी कठिनाई होती है और बड़े-बड़े निशानेबाज़ भी चूक
जाते हैं, उसी प्रकार कहीं कामदेव भी न चूक जाय ) ॥७०॥