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सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 226 में से

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पृष्ठ 140

१२४ नैषधचरितम् । [ द्वितीयः
= मेघम्, आरुह्य रसात् = रागाद् यान्ती = गच्छन्ती । अध्वनि अभ्रतरसा =
मेघवेगेन हेतुना, निमेषं न प्राप । अत्र नगरामराङ्गनयोर्भेदेऽपि अनिमेषमेवारो-
हणव्योमयानैः सैव इत्यभेदोक्तेरतिशयोक्तिभेदः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १०४ ॥
अपने प्राण-नाथ के केलि-गृह के मध्य-देश का आतिथ्य ग्रहण करने के लिए
उत्सुक (वहाँ गमन के निमित्त तैयार) - जलद (मेघ) पर अपने विलास-भवनों
की अटारियों से चढ़ती हुई, उस नगर की रमणियाँ- विमान में बैठकर, आकाश-
मार्ग से जाती हुई साक्षात् अप्सराएँ ही थीं; क्योंकि मेघ के वेग से आकाश में
जाने में रस (अनुराग) के कारण उन की आँखें निमेष-हीन (पलक गिराने
मात्र का भी विलम्ब सहन न करनेवाली; एक-टक ऊपर की ओर देखनेवाली)
हो रही थीं ॥ १०४ ॥
वैदर्भी-केलि-शैले मरकत-शिखरादुत्थितैरंशुदर्भै-
ब्रह्माण्ड।घात-भग्न-स्यदज-मदतया ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः ।
कस्या नोत्तानगाया दिवि सुर-सुरभेरास्यदेशागताग्रै-
र्यद्द्रोग्रास-प्रदान-व्रत-सुकृतमविश्रान्तमुज्जृम्भते स्म ॥ १०५ ॥
वैदर्भीति । 'उत्ताना वै देवगवा वहन्ति' इति श्रुत्यर्थमाश्रित्याह-वैदर्भी-
केलिशैले मरकतशिखरादुत्थितैः अथ [ब्रह्माण्ड।घात-भग्न-स्यदज-मदतया]
ब्रह्माण्डाघातेन भग्नः स्यदजमदो वेगगर्वो येषां तत्तया, [ह्री-धृतावाङ्-मुखत्वैः]
ह्रिया धृतं अवाङ्मुखत्वं यैस्तैरधोमुखैः । अत एव दिवि उत्तानगायाः = ऊर्ध्व-
मुखाया इत्यर्थः । कस्याः सुरसुरभेः = देवगव्याः [आस्यदेशागताग्रैः] आस्यदेशं
गताग्रैः [अंशुदर्भैः] अंशुभिरेव दर्भैः [यद् गोग्रास-प्रदान-व्रत-सुकृतं] यस्या
नगर्याः सम्बन्धि गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतम्, अविश्रान्तं प्रोज्जृम्भते स्म; किन्तु
सर्वस्य अपि ग्रासदानाद्यत्तत्सुकृतमेवोज्जृम्भितमित्यर्थः । अत्युत्तमालङ्कारोऽयमिति
केचित् । अंशुदर्भाणां ब्रह्माण्डाघाताद्यसम्बन्धेऽपि सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिः भेदः ।
स्रग्धरावृत्तम् । 'म्रभौर्यानां त्रयेण त्रिमुनियुतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्' इति लक्षणात् ॥
विदर्भ-कन्या दमयन्ती के विहार-पर्वत पर, मरकत मणि की बनी हुई चोटी से,
ऊपर की ओर किरणें जाती थीं; पर ब्रह्माण्ड के साथ टकराने से वेग का अहङ्कार
चूर-चूर हो जाने के कारण, लज्जा के मारे नीचा मुँह करके लौटती थीं; और