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सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 226 में से

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पृष्ठ 122

१०६ नैषधचरितम् । [द्वितीयः
उस से नीचे उड़ते हुए पक्षियों ने—बाज़ के झपटने की आशंका से, एक ही
नज़र से, झट ऊपर की ओर उस राजहंस की तरफ देखा—जिसके दोनों पंखों में
से वेग के कारण साँय साँय की आवाज़ निकल रही थी ॥ ७० ॥
ददृशे न जनेन यन्नसौ भुवि तच्छायामवेक्ष्य तत्क्षणात् ।
दिवि दिक्षु वितीर्णचक्षुषा पृथुवेगद्रुतमुक्तदृक्पथः ॥७१॥
ददृश इति । यन् = गच्छन् । इणो लटः शत्रादेशः । असौ = हंसः, भुवि
तच्छायां = तस्य हंसस्य छायां । 'विभाषा सेना' इत्यादिना नपुंसकत्वम् । अवेक्ष्य
तत्क्षणात् प्रथमं दिवि पश्चात् दिक्षु च वितीर्णचक्षुषा = दत्तदृष्टिना जनेन
[ पृथु-वेग-द्रुत-मुक्त-दृक्पथः ] पृथुवेगेन द्रुतं शीघ्रं मुक्तदृक्पथः सन्, न ददृशे
= न दृष्टः, क्षणमात्रेण दृष्टिप्रथमतिक्रान्त इत्यर्थः ॥ ७१ ॥
पृथ्वी पर उसकी छाया देख कर, उसी क्षण आकाश और दिशाओं की ओर
नज़र फेंकते हुए लोगों को—तेज चाल के कारण—शीघ्र ही दृष्टिमार्ग से ओझल
हो जाने वाला, उड़ता हुआ वह हंस नहीं दिखलाई पड़ता ॥ ७१ ॥
न वनं पथि शिश्रियेऽमुना क्वचिदप्युच्चतर-द्रु-चारुतम् ।
न स गोत्रजमन्ववादि वा गति-वेग-प्रसरद्रुचा रुतम् ॥७२॥
नेति । [ गतिवेग-प्रसरद्रुचा ] गतिवेगेन प्रसरद्रुचा प्रसर्पत्तेजसा, अमुना
=हंसेन पथि क्वचिदपि [ उच्चतर-द्रु-चारुतं ] उच्चतराणां अत्युन्नतानां द्रूणां
द्रुमाणां, चारुता रम्यता, यस्मिंस्तत् । वनं न शिश्रिये । सगोत्रजं = बन्धुजन्यं
रुतं = कूजितं वा नान्ववादि = नानूदितम् । मध्यमार्गे अध्वश्रमापनोदनं बन्धु-
सम्भाषणादिकमपि न कृतमिति सुहृत्कार्यानुसन्धानपरोक्तिः । 'पलाशी द्रुद्रुमागमाः'
इत्यमरः ॥ ७२ ॥
अपनी तेज चाल से कान्ति फैलाता हुआ वह हंस—मार्ग में कहीं भी बड़े
ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से सौन्दर्यशाली वनमें, (विश्राम करने के लिए) न ठहरा और न
तो अपने स-जातीय हंसों के कूजन (के प्रत्युत्तर में उस) का अनुमोदन ही किया ।
अथ भीमभुजेन पालिता नगरी मञ्जरसौ धराजिता ।
पतगस्य जगाम दृक्पथं हर-शैलोपम-सौध-राजिता ॥ ७३ ॥
अथेति । अथ धराजिता = भूमिजयिना । 'सत्सू द्विष'इत्यादिना किपि तुक् ।
[ भीमभुजेन ] भीमस्य भीमभूपस्य, भुजेन पालिता, [ हर-शैलोपम-सौध-