सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३


समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥

साथ-साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी एक ही वृक्षका आश्रय करके रहते हैं । उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है ॥ १ ॥


द्वा द्वौ सुपर्णा सुपर्णौ शोभनपतनौ सुपर्णौ पक्षिसामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा सयुजौ सहैव सर्वदा युक्तौ सखाया सखायौ समानाख्यानौ समानाभिव्यक्तिकारणावेवंभूतौ सन्तौ समानम् अविशेषोपलब्ध्यधिष्ठानतयैकं वृक्षं वृक्षमिवोच्छेदनसामान्याच्छरीरं[जीव और ईश्वररूप] दो सुपर्ण—सुन्दर पर्णवाले अर्थात् [नियम्य-नियामकभावकी प्राप्तिरूप] शोभन पतनवाले* अथवा पक्षियोंके समान [वृक्षपर निवास तथा फलभोग करनेवाले] होनेसे सुपर्ण—पक्षी तथा संयुज—सर्वदा साथ-साथ ही रहनेवाले और सखा यानी समान आख्यानवाले अर्थात् जिनकी अभिव्यक्तिका कारण समान है ऐसे दो सुपर्ण समान—सामान्यरूपसे [दोनोंकी] उपलब्धिका कारण होनेसे एक ही वृक्ष—वृक्षके समान उच्छेदमें समानता होनेके कारण शरीररूप

* ईश्वर सर्वज्ञ होनेके कारण नियामक है तथा जीव अल्पज्ञ होनेसे नियम्य है । इसलिये उनमें नियम्य-नियामकभावकी प्राप्ति उचित ही है ।