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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९


नादिनिवृत्त्यर्थम् । गुहायां शरीरे हृदये वा स्वापकाले शेरत इति गुहाशयाः, निहिताः स्थापिता धात्रा सप्त सप्त प्रतिप्राणिभेदम् ।की आशंका निवृत्त करनेके लिये है। जो सुषुप्ति-अवस्थामें गुहा—शरीर अथवा हृदयमें शयन करते हैं वे गुहाशय तथा विधाताद्वारा प्रत्येक प्राणीमें निहित—स्थापित ये सात-सात पदार्थ [ इस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं ] ।
यानि चात्मयाजिनां विदुषां कर्माणि कर्मफलानि चाविदुषां च कर्माणि तत्साधनानि कर्मफलानि च सर्वं चैतत्परस्मादेव पुरुषात्सर्वज्ञात्प्रसूतमिति प्रकरणार्थः ॥ ८ ॥इस प्रकार जो भी आत्मयाजी विद्वानोंके कर्म और कर्मफल तथा अज्ञानियोंके कर्म, कर्मफल और उनके साधन हैं वे सब उस परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं—यह इस प्रकरणका अर्थ है ॥ ८ ॥

पर्वत, नदी और ओषधि आदिका ब्रह्मजन्यत्व

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे-

ऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।

अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च

येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥

इसीसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं; इसीसे अनेक रूपोंवाली नदियाँ बहती हैं; इसीसे सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस प्रकट हुए हैं, जिस (रस) से भूतोंसे परिवेष्टित हुआ यह अन्तरात्मा स्थित होता है ॥ ९ ॥

अतः पुरुषात्समुद्राः सर्वे क्षाराद्याः, गिरयश्च हिमवदादयोऽस्मादेव पुरुषात्सर्वे। स्यन्दन्ते स्रवन्तिइस पुरुषसे ही क्षारादि सात समुद्र और इसीसे हिमालय आदि समस्त पर्वत उत्पन्न हुए हैं। गङ्गा