सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४१
रूपात्सर्वकार्यकारणबीजत्वेनोप-होता है उस अक्षरसे—सम्पूर्ण
लक्ष्यमाणत्वात्परं तदुपाधिलक्षण-कार्य-कारणके बीजरूपसे उपलक्षित
मव्याकृताख्यमक्षरं सर्वविकारेभ्यःहोनेके कारण उन उपाधियोंवाला
तस्मात्परतोऽक्षरात्परो निरु-अव्याकृतसंज्ञक वह अक्षर अपने
पाधिकः पुरुष इत्यर्थः ।सम्पूर्ण विकारसे श्रेष्ठ है; उस सर्वोत्कृष्ट .<br>अक्षरसे भी वह निरुपाधिक पुरुष<br>उत्कृष्ट है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
यस्मिंस्तदाकाशाख्यमक्षरंकिन्तु जिसमें सम्पूर्ण व्यवहार-
संव्यवहारविषयमोतं प्रोतं चका विषयभूत वह आकाशसंज्ञक
कथं पुनरप्राणादिमत्त्वं तस्येत्यु-अक्षरतत्त्व ओतप्रोत है वह
च्यते । यदि हि प्राणादयः प्रागु-प्राणादिसे रहित कैसे हो सकता
त्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मनाहै ? ऐसी शङ्का होनेपर कहते<br>हैं—यदि प्राणादि अपनी उत्पत्तिसे
सन्ति तदा पुरुषस्य प्राणादिनापूर्व भी पुरुषके समान स्वरूपसे
विद्यमानेन प्राणादिमत्त्वं भवेन्नविद्यमान रहते तो उन विद्यमान
तु ते प्राणादयः प्रागुत्पत्तेःप्राणादिके कारण पुरुषका प्राणादि-<br>युक्त होना माना जा सकता था ।
पुरुष इव स्वेनात्मनां सन्तिकिन्तु उस समय वे अपनी उत्पत्तिसे<br>पूर्व पुरुषके समान स्वरूपतः हैं नहीं;
तदा, अतोऽप्राणादिमान्परःइसलिये, जिस प्रकार पुत्र उत्पन्न न
पुरुषः; यथानुत्पन्ने पुत्रेऽपुत्रोहोनेतक देवदत्त पुत्रहीन कहा जाता
देवदत्तः ॥ २ ॥है उसी प्रकार परम पुरुष भी<br>अप्राणादिमान् है ॥ २ ॥

४