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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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३५मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

अविद्याग्रस्त कर्मठोंकी दुर्दशा

किञ्च— | तथा—

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥

अविद्याके मध्यमें रहनेवाले और अपनेको बड़ा बुद्धिमान् तथा पण्डित माननेवाले वे मूढ पुरुष अन्धेसे ले जाये जाते हुए अन्धेके समान पीडित होते सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ८ ॥

अविद्यायामन्तरे मध्ये वर्तमाना अविवेकप्रायाः स्वयं वयमेव धीरा धीमन्तः पण्डिता विदितवेदितव्याश्चेति मन्यमाना आत्मानं सम्भावयन्तस्ते च जङ्घन्यमाना जरारोगाद्यनेकानर्थव्रातैः हन्यमाना भृशं पीड्यमानाः परियन्ति विभ्रमन्ति मूढाः । दर्शनवर्जितत्वादन्धेनैवाचक्षुष्केणैव नीयमानाः प्रदर्श्यमानमार्गा यथा लोकेऽन्धा अक्षिरहिता गर्तकण्टकादौ पतन्ति तद्वत् ॥ ८ ॥अविद्याके मध्यमें रहनेवाले बहुधा अविवेकी किन्तु 'हम ही बड़े बुद्धिमान् और पण्डित—ज्ञेय वस्तुको जाननेवाले हैं' ऐसा मानकर अपनेको सम्मानित करनेवाले वे मूढ पुरुष—जरारोग आदि अनेक अनर्थजालसे जङ्घन्यमान—हन्यमान अर्थात् अत्यन्त पीड़ित होते सब ओर घूमते—भटकते रहते हैं । जिस प्रकार लोकमें दृष्टिहीन होनेके कारण अन्धे अर्थात् नेत्रहीनसे ले जाये जाते हुए—मार्ग प्रदर्शित किये जाते हुए अन्धे—नेत्रहीन पुरुष गड्ढे और काँटे आदिमें गिरते रहते हैं उसी प्रकार [ वे भी पीडा-पर-पीडा उठाते रहते हैं] ॥८॥