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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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२०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

[ ज्ञानरूप ] तपके द्वारा ब्रह्म कुछ उपचय ( स्थूलता ) को प्राप्त हो जाता है, उसीसे अन्न उत्पन्न होता है । फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, सत्य, लोक, कर्म और कर्मसे अमृतसंज्ञक कर्मफल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

तपसा ज्ञानेनोत्पत्तिविधिज्ञ-उत्पत्तिविधिकाज्ञाता होनेके कारण तप अर्थात् ज्ञानसे भूतोंका कारण-
तया भूतयोन्यक्षरं ब्रह्म चीयतरूप अक्षरब्रह्म उपचित होता है; अर्थात् इस जगत्को उत्पन्न करनेकी
उपचीयत उत्पिपादयिषदिदंइच्छा करते हुए वह कुछ स्थूलताको प्राप्त हो जाता है, जैसे अङ्कुर-
जगदङ्कुरमिव बीजमुच्छूनतांरूपमें परिणत होता हुआ बीज कुछ स्थूल हो जाता अथवा पुत्र उत्पन्न
गच्छति पुत्रमिव पिता हर्षेण ।करनेकी इच्छावाला पिता हर्षसे उल्लसित हो जाता है ।
एवं सर्वज्ञतया सृष्टिस्थितिसंहारशक्तिविज्ञानवत्त्वोपचितात्इस प्रकार सर्वज्ञ होनेके कारण सृष्टि स्थिति और संहार-शक्तिकी विज्ञानवत्ततासे वृद्धिको प्राप्त हुए
ततो ब्रह्मणोऽन्नमद्यते भुज्यतउस ब्रह्मसे अन्न—जो खाया यानी भोजन किया जाय उसे अन्न
इत्यन्नमव्याकृतं साधारणं संसा-कहते हैं, वह सबका साधारण कारणरूप अव्याकृत संसारियोंकी
रिणां व्याचिकीर्षितावस्थारूपेणव्याचिकीर्षित ( व्यक्त की जाने-
अभिजायत उत्पद्यते । ततश्चवाली ) अवस्थारूपसे उत्पन्न होता है । उस अव्याकृतसे यानी व्याचि-
अव्याकृताद्व्याचिकीर्षितावस्थातःकीर्षित अवस्थावाले अन्नसे प्राण—
अन्नात्प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्मणोहिरण्यगर्भ यानी ब्रह्मकी ज्ञान और क्रियाशक्तियोंसे अधिष्ठित, व्यष्टि
ज्ञानक्रियाशक्त्यधिष्ठितजगत्सा-जीवोंका समष्टिरूप तथा अविद्या,
धारणोऽविद्याकामकर्मभूतसमु-काम, कर्म और भूतोंके समुदायरूप