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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९


विधिवद्विशेषणादुपसदनविधेः पूर्वेषामनियम इति गम्यते । मर्यादाकरणार्थं मध्यदीपिकान्यायार्थं वा विशेषणम्; अस्मदादिष्वप्युपसदनविधेरिष्टत्वात् । <br><br> किमित्याह—कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते नु इति वितर्के, भगवो हे भगवन्सर्वं यदिदं विज्ञेयं विज्ञातं विशेषेण ज्ञातमवगतं भवतीति एकस्मिञ्ज्ञाते सर्वविद्भवतीति शिष्टप्रवादं श्रुतवाञ्शौनकस्तद्विशेषं विज्ञातुकामः सन्कस्मिन्न्विति वितर्कयन्पप्रच्छ । अथवा लोकसामान्यदृष्ट्या ज्ञात्वैव पप्रच्छ । सन्ति लोकेयह जाना जाता है कि इनसे पूर्व आचार्योंमें [ गुरूपसदनका ] कोई नियम नहीं था । अतः इसकी मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये अथवा मध्यदीपिकान्यायके लिये* यह विशेषण दिया गया है, क्योंकि यह उपसदनविधि हमलोगोंमें भी माननीय है। <br><br> शौनकने क्या पूछा, सो बतलाते हैं—भगवः—हे भगवन् ! 'कस्मिन्नु' किस वस्तुके जान लिये जानेपर यह सब विज्ञेय पदार्थ विज्ञात—विशेषरूपसे ज्ञात यानी अवगत हो जाता है ? यहाँ 'नु' का प्रयोग वितर्क (संशय) के लिये किया गया है । शौनकने 'एकहीको जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है' ऐसी कोई सभ्य पुरुषोंकी कहावत सुनी थी । उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे ही उसने 'कस्मिन्नु' इत्यादि रूपसे वितर्क करते हुए पूछा । अथवा लोगोंकी सामान्य दृष्टिसे जान-बूझकर ही पूछा । लोकमें

* देहलीपर दीपक रखनेसे उसका प्रकाश भीतर-बाहर दोनों ओर पड़ता है—इसीको मध्यदीपिका या देहलीदीपन्याय कहते हैं। अतः यदि यह कथन इस न्यायसे ही हो तो यह समझना चाहिये कि गुरूपसदन-विधि इससे पूर्व भी थी और उससे पीछे हमलोगोंके लिये भी आवश्यक है; और यदि यह कथन मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये हो तो यह समझना चाहिये कि यहींसे इस पद्धतिका आरम्भ हुआ ।