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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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पृष्ठ 126
११६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
ब्रह्मविद्प्यन्यां गतिं मृतो गच्छति न ब्रह्मैव ।विघ्न उपस्थित कर दिये जानेसे ब्रह्मवेत्ता भी मरनेपर किसी दूसरी गतिको प्राप्त हो जायगा—ब्रह्मको ही प्राप्त न होगा ।
न; विद्ययैव सर्वप्रतिबन्धस्यापनीतत्वात् । अविद्याप्रतिबन्धमात्रो हि मोक्षो नान्यप्रतिबन्धः, नित्यत्वादात्मभूतत्वाच्च। तस्मात्—**समाधान—**नहीं, विद्यासे ही समस्त प्रतिबन्धोंके निवृत्त हो जानेके कारण [ ऐसा नहीं होगा ] । मोक्ष केवल अविद्यारूप प्रतिबन्धवाला ही है, और किसी प्रतिबन्ध-वाला नहीं है, क्योंकि वह नित्य और सबका आत्मस्वरूप है । इसलिये—

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥

जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है । उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता । वह शोकको तर जाता है, पापको पार कर लेता है और हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

स यः कश्चिद् द्वै लोके तत्परमं ब्रह्म वेद साक्षादहमेवास्मीति स नान्यां गतिं गच्छति । देवैरपि तस्य ब्रह्मप्राप्तिं प्रति विघ्नो न शक्यते कर्तुम् । आत्मा ह्येषां सइस लोकमें जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है—‘वह साक्षात् मैं ही हूँ’ ऐसा समझ लेता है, वह किसी अन्य गतिको प्राप्त नहीं होता । उसकी ब्रह्मप्राप्तिमें देवतालोग भी विघ्न उपस्थित नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो उनका