सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११
विज्ञेयः सोऽर्थः सुनिश्चितो येषांहै। वह अर्थ जिन्हें अच्छी तरह
ते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः।निश्चित हो गया है वे 'वेदान्त-
ते च संन्यासयोगात्सर्वकर्मपरि-विज्ञानसुनिश्चितार्थ' कहलाते हैं।
त्यागलक्षणयोगात्केवलब्रह्मनिष्ठा-वे संन्यासयोगसे—सर्वकर्मपरित्याग-
स्वरूपाद्योगाद्यतयो यतनशीलाःरूप योगसे अर्थात् केवल ब्रह्मनिष्ठा-
शुद्धसत्त्वाः शुद्धं सत्त्वं येषांस्वरूप योगसे यत्न करनेवाले और
संन्यासयोगात्ते शुद्धसत्त्वाः । तेशुद्धसत्त्व—संन्यासयोगसे जिनका
ब्रह्मलोकेषु—संसारिणां ये मरण-सत्त्व (चित्त) शुद्ध हो गया है ऐसे वे
कालास्तेऽपरान्तास्तानपेक्ष्य मुमु-शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकोंमें परामृत—
क्षूणां संसारावसाने देहपरित्याग-परम अमृत यानी अमरणधर्मा ब्रह्म
कालः परान्तकालस्तस्मिन्परा-ही जिनका आत्मस्वरूप हैं ऐसे
न्तकाले साधकानां बहुत्वान्ब्रह्मैवजीवित अवस्थामें ही परामृत यानी
लोको ब्रह्मलोक एकोऽप्यनेकवद्ब्रह्मभूत होकर दीपनिर्वाण अथवा
दृश्यते प्राप्यते वा, अतो बहुवचनं[घटके फूटनेपर] घटाकाशके समान
ब्रह्मलोकेष्विति ब्रह्मणीत्यर्थः—परिमुक्त यानी निवृत्तिको प्राप्त हो
परामृताः परममृतममरणधर्मकंजाते हैं। वे सब परि अर्थात्
ब्रह्मात्मभूतं येषां ते परा-सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं।
मृता जीवन्त एव ब्रह्मभूताःकिसी अन्य गन्तव्य देशान्तरकी
परामृताः सन्तः परिमुच्यन्ति परिअपेक्षा नहीं करते। संसारी पुरुषों-
समन्तात्प्रदीपनिर्वाणवद् घटा-के जो अन्तकाल होते हैं वे
'अपरान्तकाल' हैं उनकी अपेक्षा
मुमुक्षुओंके संसारका अन्त हो
जानेपर उनका जो देहपरित्याग-
का समय है वह 'परान्तकाल' है।
उस परान्तकालमें वे ब्रह्मलोकोंमें—
बहुत-से साधक होनेके कारण यहाँ