सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

खण्ड २ ] • शाङ्करभाष्यार्थ १०९


आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्रकार

कथं ब्रह्म संविशत इत्युच्यते—विद्वान् किस प्रकार ब्रह्ममें प्रविष्ट होता है सो बतलाया जाता है—

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः

कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा

युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥

इस आत्माको प्राप्तकर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त और प्रशान्त हो जाते हैं। वे धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्मको सब ओर प्राप्त कर [ मरणकालमें ] समाहितचित्त हो सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ५ ॥

| संप्राप्य समवगम्यैनमात्मा- | इस आत्माको सम्यक् प्रकारसे |
| नमृषयो दर्शनवन्तस्तेनैव ज्ञानेन | प्राप्तकर—जानकर ऋषि अर्थात् |
| तृप्ता न बाह्येन तृप्ति- | आत्मदर्शनवान् लोग, शरीरको पुष्ट |
| साधनेन शरीरोपचयकारणेन | करनेवाले किसी बाह्य तृप्तिसाधनसे |
| कृतात्मानः परमात्मस्वरूपेणैव | नहीं बल्कि उस ज्ञानसे ही तृप्त |
| निष्पन्नात्मानः सन्तो वीतरागाः | हो कृतात्मा—जिनका आत्मा |
| वीतरागादिदोषाः प्रशान्ता | परमात्मस्वरूपसे ही निष्पन्न हो गया |
| उपरतेन्द्रियाः । | है ऐसे होकर तथा वीतराग— |
| त एवंभूताः सर्वगं सर्वव्या- | रागादि दोषोंसे रहित और प्रशान्त |
| पिनमाकाशवत्सर्वतः सर्वत्र प्राप्य | यानी उपरतेन्द्रिय हो जाते हैं। |
| —नोपाधिपरिच्छिन्नेनैकदेशेन, | ऐसे भावको प्राप्त हुए वे लोग |
| | सर्वग—आकाशके समान सर्व- |
| | व्यापक ब्रह्मको, उपाधिपरिच्छिन्न |
| | एक देशमें नहीं, बल्कि सर्वत्र |