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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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पृष्ठ 100
९०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

| यस्त्वेवं साक्षादात्मानं प्राणस्य प्राण विद्दानतिवादी स न भवतीत्यर्थः । सर्वं यदात्मैव नान्यदस्तीति दृष्टं तदा किं ह्यसावतीत्य वदेत् । यस्य त्यपरम् अन्यदृष्टमस्ति स तदतीत्य वदति । अयं तु विद्वानात्मनोऽन्यन्न पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । अतो नातिवदति । | तात्पर्य यह कि जो इस प्रकार प्राणके प्राण साक्षात् आत्माको जाननेवाला है वह अतिवादी नहीं होता । जब कि उसने यह देखा है कि सब आत्मा ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है तब वह किसका अतिक्रमण करके बोलेगा ? जिसकी दृष्टिमें कुछ और दीखनेवाला पदार्थ है वही उसका अतिक्रमण करके बोलता है । किन्तु यह विद्वान् तो आत्मासे भिन्न न कुछ देखता है, न सुनता है और न कुछ जानता ही है । इसलिये यह अतिवादन भी नहीं करता । |
| किं चात्मक्रीड आत्मन्येव च क्रीडा क्रीडनं यस्य नान्यत्र पुत्रदारादिषु स आत्मक्रीडः। तथात्मरतिरात्मन्येव च रती रमणं प्रीतिर्यस्य स आत्मरतिः । क्रीडा बाह्यसाधनसापेक्षा, रतिस्तु | यही नहीं, वह [आत्मक्रीड, आत्मरति और क्रियावान् हो जाता है।] आत्मक्रीड—जिसकी आत्मामें ही क्रीडा हो, अन्य स्त्री-पुत्रादिमें न हो उसे आत्मक्रीड कहते हैं; तथा जिसकी आत्मामें ही रति— रमण यानी प्रीति हो वह आत्मरति कहलाता है । क्रीडा बाह्य साधनकी अपेक्षा रखनेवाली होती है और |


वह 'इत्थंभूतलक्षण' कहलाता है; उसमें तृतीया विभक्ति होती है । जैसे 'जटाभिस्तापसः' ( जटाओंसे तपस्वी है ) इस वाक्यमें जटाओंके द्वारा तपस्वी होना लक्षित होता है; अतः 'जटा' में तृतीया विभक्ति है । इसी प्रकार 'सर्वभूत' शब्दसे ईश्वरका सब भूतोंमें स्थित होना लक्षित होता है ।