मूलमध्यमककारिका (आचार्य नागार्जुन - चन्द्रकीर्ति प्रणीत प्रसन्नपदा व्याख्या सहित)
Mulamadhyamakakarika of Nagarjuna with Prasannapada Commentary
आचार्य नागार्जुन (टीकाकार: आचार्य चन्द्रकीर्ति) द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंो.
Wait, look at the image: there is:
ध - र्मा - न् - ति - र् - म् ?
Wait! Look at line 5 (verse 27):
"धर्मात्कीर्तिः"
Here: ध - र्मा - त् - की - र्तिः.
Now look at line 7 (verse 28):
"धर्म एव परा नीतिर्धर्मार्ल्लोकोऽनुरज्यते" - wait, why are there so many letters?
Let's transcribe letter by letter:
ध र् म [space] ए व [space] प रा [space] नी ति र् ध र्मा [?] ल् हे [?] क ो ऽ न ु र ज्य ते
Wait! Could it be: "नीतिर्धर्मान्नेहोऽनुरज्यते"?
Wait, look at line 8:
"रञ्जितेन हि लोकेन नेह नामुत्र वञ्च्यते ।। २८ ।।"
Ah! "रञ्जितेन हि लोकेन नेह नामुत्र वञ्च्यते"!
And line 9:
"अधर्मेण तु या नीतिस्तया लोकोऽपकृष्यते ।"
"लोकापरञ्जनाच्चैव नेह नामुत्र नन्दति ।। २९ ।।"
Now look at verse 28 again:
Line 1: "धर्म एव परा नीतिर्..."
Line 2: "